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“तिरंगा सिसक रहा है “

“पन्द्रह अगस्त देश की आज़ादी का दिन”
      अंग्रेज़ों की कई सौ वर्षों की ग़ुलामी के बाद
     “ पन्द्रह अगस्त  1947 “ को भारत आज़ाद हुआ “
        “पर यह आज़ादी सस्ती ना थी
        जो उजड़ी ना हो ऐसी कोई बस्ती ना थी
        कई माताओं की कोख उजड़ी ,
        कई बहनो की माँग सूनी हुई
        कई शहीदों की गर्दन सूली पर चड़ी
        हाय बड़ा ही दर्दनीय होगा ये मंज़र
        सुनते ही वीर शहीदों की शोर्य गथाएँ
        रोंगटे खड़े हो चुभ जाते हैं खंजर
        हाय !आज़ादी सस्ती नहीं थी “

       आज भारत देश की आज़ादी की शान में
       भारत का तिरंगा ,भारत का झंड़ा , भारत की
       आन - बान और शान का प्रतीक,
       आसमान की ऊँचाइयाँ छू रहा है ।
       देश आर्थिक रूप से उन्नति व प्रगर्ती की ऊँचाइयों की
       और बड़ रहा है ।
       देश का हर व्यक्ति आज स्वतन्त्र है
       क्योंकि अब तो प्रजातंत्र है
       “ माना की प्रजातंत्र है “
      जब भारत स्वतन्त्र हुआ ,
      तभी से एक अनोखा षड्यंत्र हुआ
      हिंदुस्तान विभाजित हुआ
      पाकिस्तान का जन्म हुआ
     दो सीमाओं में ये कैसा बँटवारा हुआ
 …

☔️⛈“सावन के झूले “⛈☘️🌿

🌧🎡“सावन के झूले पड़े थे      मन्त्रमुग्ध सब झूल रहे थे     वसुन्धरा से अम्बर की ओर पींगे भर रहे थे “    तभी ....... “अम्बर ने “वसुन्धरा”को जब निहारा 🌎
🌧मेघों से घिर गया अम्बर सारा “ मेघों ने सुन्दर - सुन्दर आकृतियाँ बनायीं ☁️⛈ जो सबके मन को लुभायीं “ बिजली भी चमकी ..... फिर छम के बरसा छम -छम के बरसा  🌧⛈अम्बर से मेघों का बन ,वर्षा का जल सारा  वसुन्धरा  भी प्यासी तृप्त हुईं  हरी-भरी धरती प्रफुल्लित हुई , कोयल ने भी सुमधुर संगीत सुनाया  मयूर ने भी नृत्य से मन लुभाया ।
वृक्षों की डालियों ने बाँहें फैलायी 🌴 प्रकृति ने आवाज लगायीं  सावन की रिमझिम वर्षा है आयीं ☔️ चलो सखियों झूलन की ऋतु है आयी  सुख -समृद्धि और सम्पन्नता का संदेशा लायी ।🎄🌴🍃🍀 धरा ने अम्बर कीओर निहारा  और कहा तुमने तो भिगो दिया  मेरा आँचल सारा,सुखी पड़ी धरती को तुमने तृप्त किया । तुमसे ही मेरा जीवन समृद्ध हुआ  सम्भव नहीं है , तुम बिन जीवन हमारा  जबकि तु एक किनारा मैं एक किनारा  हमसे ही तो सृष्टि का अस्तित्व सारा ।☔️☔️🌧






“काग़ज़ की कश्ती “

🎉” अच्छा हुआ कोई दिल की 🎉”
सुनने वाला नहीं मिला
जो दिल में आया वो
काग़ज़ पर लिख दिया
जो लिख दिया तो,सबने
पढ़ लिया “

“ सबने कहाँ तुमने तो हमारे दिल
का हाल लिख दिया
मैंने तो अपने दिल का हाल लिखा था
सबके दिल का फसाना
आशिके तराना एक ही सा था .....
सबका सवाल एक ही था ......
विचारों का तूफ़ान भी एक ही था ....
फिर सबने मिल बैठ कर अपने दिल का .....
बोझ हल्का कर लिया “🎉🎉🎉

“काग़ज़ की कश्ती बनायीं
स्याही में क़लम डुबाई
दिल की बात शब्दों के
माध्यम से विचारों में परिवर्तित
हो आख़िर दिल से बाहर आयी
सभी उस कश्ती में सवार थे जो थी
मैंने बनायीं “


“आध्यातम और वास्तविकता “

“ भक्ति श्रद्धा है , आस्था है ,शुभ भावनायें हैं “
                             भक्ति को अन्धी दौड़ ना बनाये ,परमात्मा तो सर्वत्र है”

 🎉🎉🎉🎉🎉 भारतीय संस्कृति ,विभिन्न रंगों में रंगी ,अद्भुत ,अतुलनीय है ।
                            इन्द्र्ध्नुष के रंगो में रंगा ,विभिन्न संस्कृतियाँ भिन्न -भिन्न रूप -रंगो से रंगे प्रत्येक प्रान्त की अपनी एक अलग पहचान है ।
 विभिन्न रूप हैं ,भाषायें अनेक हैं , फिर भी “हम भारतीय एक हैं “
वास्तव में भारत में हर एक प्रान्त अपना जीवन जीता है ,अपने -अपने प्रान्त की अतुलनिय ,अद्भुत छ्टा लिए हर प्रान्त इन्द्रधनुष के रंगो की भाँति भारत में सतरंगी छ्टा बिखेरता है ।
भारतवर्ष प्राचीन काल से ही ,भक्ति प्रधान देश रहा है ।
आस्था उस “परमसत्ता परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण , विश्वास ...,

 हमारी भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से आध्यात्मिक रहस्यों से प्रेरित है ,और इसका प्रमाण हमारे प्राचीन वेद ,ग्रन्थ,पुराण इत्यादि हैं । आध्यात्मिकता के कई गूढ़ रहस्यों को हमारे आध्यात्मिक  गुरुओं ने अपनी तपस्या के प्रताप से जाना है । आध्यात्मिकता के क्षेत्र म…

“एक आवाज़”

“जब से मैंने अन्तरात्मा की आवाज सुनी    उसके बाद ज़माने में किसी की नहीं सुनी “
“सभ्य, सुसंस्कृत -संस्कारों”से रहित    ज़िन्दगी कुछ भी नहीं —-“सभ्य संस्कारों “   के बीज जब पड़ते हैं , तभी जीवन में नये-नये    इतिहास रचे जाते हैं ।
“आगे बहुत आगे निकल आया हूँ “मैं”
ज़िन्दगी के सफ़र में चलते-चलते “
“डरा-सहमा ,घबराराया , थका -हारा ,निराश  सब कोशिशें, बेकार  मैं असाहाय ,बस अब  और नहीं , अंत अब निश्चित था  जीवन के कई पल ऐसे गुज़रें “ “ज़िन्दगी की जंग इतनी भी आसान ना थी  जब तक मैंने अन्तरात्मा की आवाज़ ना सुनी थी           “तब तक “ जब से अन्तरात्मा की आवाज़ सुनी  उसके बाद ज़माने में किसी की नहीं सुनी “
“कर्मों में जिनके शाश्वत की मशाल हो  उस पर परमात्मा भी निहाल हो “ “नयी मंज़िल है ,नया कारवाँ है  नये ज़माने की , सुसंस्कृत तस्वीर  बनाने को ,’नया भव्य , सुसंस्कृत  खुला आसमान है “
“एक आवाज़ जो मुझे हर -पल
दस्तक देती रहती है , कहती है
जा दुनियाँ को सुन्दर विचारों के
सपनों से सजा , पर ध्यान रखना
कभी किसी का दिल ना दुखे
संभल कर ज़रा .......
सँभल कर ज़रा..,.,



“ बहारें तो आज भी आती हैं “

रौनक़ें बहार तो हमारे आँगन
    की भी कम ना थीं , चर्चा में तो हम
     हमेशा से रहते थे
   “बहारें तो आज भी आती हैं
    वृक्षों की डालों पर पड़ जाते है झूले ,
    झूलों पर बैठ सखियाँ हँसी -ख़ुशी के
    गीत जब गाती हैं , लतायें भी अँगड़ायी
    लेकर इतराती हैं

“  आँगन भी है ,
  क्यारियाँ भी हैं
 हरियाली की भी ख़ूब बहार है
 पर मेरे आँगन के पुष्पों ने
 अपनी -अपनी अलग -अलग
 क्यारियाँ बना ली हैं
 वो जो पुष्प मेरे आँगन की रौनक़ थे
 वो आज किसी और आँगन की शोभा
 बड़ा रहे हैं , अपनी महक से सबको लुभा रहे हैं

 कभी -कभी उदास बहुत उदास हो जाता हूँ
 पर फिर जब दूर से मुस्कुराते देखता हूँ
 अपने पुष्पों को तो ,ख़ुश हो जाता हूँ
 आख़िर उनकी भी तो चाह है
अपनी दुनियाँ बसाने की
ख़्वाब सजाने की
चलो उन्हें भी तो अपनी दुनियाँ बसाने का हक़ दो
दूर से ही सही ,
अपने पुष्पों को मुस्करता देख
मीठे दर्द की दवा ढूँढ लेता हूँ
जीने की वजह ढूँढ लेता हूँ ।





🎉🎉“निशान “🎉🎉

“ आऊँगा बहुत याद आऊँगा
   सफ़र में कुचैले निशान छोड़ जाऊँगा “
   सफ़र हो तो ऐसा ,
   राह भी अपनी है,
   मंज़िल भी अपनी
  कारवाँ की तलाश भी अपनी
  तलाश में चाह भी अपनी
  आह भी अपनी .....
  वाह भी अपनी ........
  जब बहारों के जश्न भी अपने
  तो पतझड़ और तूफ़ान भी अपने
  जज़्बातों के हालात भी अपने
  सफ़र भी अपना ।।
“  सफ़र करते -करते मुसाफ़िर हूँ
 भूल गया हूँ , अपने कारवाँ में
 घुल - मिल गया हूँ
 बेशक ये सफ़र है
 मैं मुसाफ़िर हूँ जाने से पहले
अपने निशान छोड़ जाऊँगा
आऊँगा बहुत याद आऊँगा
सफ़र में कूछ ऐसे निशान छोड़ जाऊँगा ।।



✍️“प्रयास”✍️

🎉🎉🎉🎉✍️✍️
                               नियमाते ज़िन्दगी में लुटाता है ,वो हर पल
                               ए मानव तुम सही राह तो चलो ,
                               रास्ते मुश्किल ही सही ,
                               मंज़िल पर पहुँचाता है वो ही
                               वो हमारे हर प्रयास में
                               हमारे विश्वास में है
                              हर मुश्किल हालात में है
                              मंज़िल दूर सही ,पर नामुमकिन
                              कुछ भी नहीं ,
                              चाँद पर पहुँचाता है वो ही
                             अन्तरिक्ष में नक्षत्र गिनवाता है वो ही
                             तू थोड़ा विश्वास तो रख
                             तेरे अन्दर से आवाज़ लगाता है वो ही
                             धरती पर आया है ,तो जीवन सुधार
                             मत रो - रो कर जीवन गुज़ार
                             तुम  धरती पर जीवन का आधार हो
                             अपने जीवन को सुधार तो सही
         …

“योग दिव्य योग शुभ संजोग “

“योग दिव्य योग शुभ संजोग “  ।।
—।।—————।।—————-।।
“संजोग से बनता है जब दिव्य योग
तब कट जाते हैं जीवन के सारे रोग”

योग ,यानि स्वयं पर नियंत्रण
मानसिक योग —-शारीरिक  योग

शारीरिक योग शरीर को स्वस्थ करता है । शारीरिक योग का स्वयं में बहुत महत्व है ।

स्वस्थ तन हो तो मन भी स्वस्थ रहता है ।
शरीर रूपी मिट्टी के दिये में ,दिव्य प्रकाश तभी
सुरक्षित रहेगा ,जब उसमें कोई खोट ना हो ।
“सहयोग यानि संग का योग  जब बनते हैं संजोग  कारण होता है ,योग  संग रहने का योग

योग भारतवर्ष को प्रदत्त
स्वयं सृष्टिकर्ता द्वारा प्राप्त
दिव्य प्रकाशमयी अनुपम भेंट है
शारीरिक एवम् मानसिक योग
संजीवनी अक्षय सम्पदा

तन और मन का संतुलन
है ,मनुष्य जीवन का शुभ संजोग
निरोगी तन ,संतुलित मन
यही है मनुष्य जीवन का शुभ संजोग ।
दिव्य खोज ,दिव्य योग ।

“सुनहरे पंख”

“ पिंजरों से निकल कर पंछी
     जब आजाद हुए ,सुनहरे अक्षरों में
        अपनी तक़दीर
     लिखने को बेताब हुए.....
     छूने को आसमान हम इस क़दर
     पंख फड़फड़ायेंग़े राहों की हर बाधा
     से लड़ जायेंगे ,आसमान में अपने घरौंदे
     बना आयेंगे ,नये इतिहास की नयी इबारत
     लिख जाएँगे किसी के जीने का मक़सद
     बन जायेंगे ।

   “अभी तो पंख फड़फड़ाये हैं थोड़ा इतराएहैं
   खिलखिखिला रहा है बचपन
  मुस्कराता बचपन”
 👫बचपन मीठा बचपन ,
       सरल बचपन
       सच्चा बचपन 👯‍♂️

  “ वो गर्मियों की छुट्टियाँ
    बच्चों के चेहरों पर खिलती
        फुलझड़ियाँ”

 “घरों के आंगनो में लौट आयी है रौनक़
सूने पड़े गली -मोहल्ले भी चहकने लगे हैं ।
बूडे दादा -दादी भी खिड़कियों से झाँक-झाँक कर
देखने लगे हैं , सुस्त पड़े चहरे भी खिल गये हैं
मन ही मन मुस्काते हैं , पर बड़पन्न का रौब दिखाते हैं
आइसक्रीम और क़ुल्फ़ियों की होड़ लगी है
ठंडाई भी ख़ूब उछल रही है
पानी -पूरी भी ख़ूब डुबकी लगा रही है
पिज़्ज़ा ,बरगर ,पस्ता भी सबको लुभा रहे हैं
चिंटू ,चिंकी ,सिद्धु ,निकी भी सब मस्त हैं
सपनों को सच करने को
बड़े बुज़र्गों से…

“ झगड़ा ताक़त नहीं कमज़ोरी है “

“झगड़ा ताक़त नहीं कमज़ोरी है जनाब “
सत्य,प्रेम ,करुणा सबको बाँध रखती है ,और एक जादूयी शक्ति है “।
“झगड़ा करने वाला हमेशा यह सोचता है कि,झगड़ा उसकी ताक़त है ।वह झगड़ा करके सबको चुप करा देगा और कर देता भी है ।
हाँ सच भी कुछ समय के लिये कुछ लोग झगड़े से बचने के लिये चुप भी हो जाते हैं ।
अब तो झगड़ा करने वाले की यह आदत ही बन जाती है ,वो सोचता रहता है यह जो मेरा हथियार है “झगड़ा “बहुत ताक़तवर है सबको चुप कर देता है ।

परन्तु जाने -अनजाने वो ग़लत सोच पल रहा होता है ,झगड़ा कभी भी ताक़त नहीं बन सकता ,झगड़ा एक ऐसा हथियार है जो दूसरे सेज़्यादा स्वयं का ही नुक़सानकर रहा होता है ।

झगड़े को छोड़कर ,अगर अपनी बात को नम्रता से और पूर्ण विश्वास से किसी के समक्ष रखते हैं तो उसका प्रभाव ही अलग होता है
वह प्रेमपूर्ण व्यवहाएक अमिट छाप छोड़ता है सामने वाले की मनःसितिथी पर ...
“ अतः झगड़ा एक ऐसा हथियार है ,जो दूसरे से ज़्यादा स्वयं का ही नुक़सान करता है ,फिर क्यो ना ऐसे हथियार का उपयोग किया जाये
जो सबसे पहलेस्वयं को सुरक्षित रखे ।
सच मानिये प्रेम से कही बात झगड़े से ज़्यादा प्रभावपूर्ण होती ह…

“ झगड़ा ताक़त नहीं कमज़ोरी है “

“झगड़ा ताक़त नहीं कमज़ोरी है जनाब “
सत्य,प्रेम ,करुणा सबको बाँध रखती है ,और एक जादूयी शक्ति है “।
“झगड़ा करने वाला हमेशा यह सोचता है कि,झगड़ा उसकी ताक़त है ।वह झगड़ा करके सबको चुप करा देगा और कर देता भी है ।
हाँ सच भी कुछ समय के लिये कुछ लोग झगड़े से बचने के लिये चुप भी हो जाते हैं ।
अब तो झगड़ा करने वाले की यह आदत ही बन जाती है ,वो सोचता रहता है यह जो मेरा हथियार है “झगड़ा “बहुत ताक़तवर है सबको चुप कर देता है ।

परन्तु जाने -अनजाने वो ग़लत सोच पल रहा होता है ,झगड़ा कभी भी ताक़त नहीं बन सकता ,झगड़ा एक ऐसा हथियार है जो दूसरे सेज़्यादा स्वयं का ही नुक़सानकर रहा होता है ।

झगड़े को छोड़कर ,अगर अपनी बात को नम्रता से और पूर्ण विश्वास से किसी के समक्ष रखते हैं तो उसका प्रभाव ही अलग होता है
वह प्रेमपूर्ण व्यवहाएक अमिट छाप छोड़ता है सामने वाले की मनःसितिथी पर ...
“ अतः झगड़ा एक ऐसा हथियार है ,जो दूसरे से ज़्यादा स्वयं का ही नुक़सान करता है ,फिर क्यो ना ऐसे हथियार का उपयोग किया जाये
जो सबसे पहलेस्वयं को सुरक्षित रखे ।
सच मानिये प्रेम से कही बात झगड़े से ज़्यादा प्रभावपूर्ण होती ह…

कोरा काग़ज़ है ,या हसीन ख़्वाब है ज़िन्दगी 🌸🌸

“यूँ तो कोरा काग़ज़ है ज़िन्दगी
  ये भी सच है ,कि कर्मों का
 हिसाब - किताब है ज़िन्दगी “

 “कोरा काग़ज़ है या हसीन ख़्वाब है
             ज़िन्दगी
दूर से देखा तो आफ़ताब है ज़िन्दगी
-                  -                      -
कहीं समतल कहीं गहरी खाई
तो कहीं पहाड़ सी है ,ज़िन्दगी “

  “पृष्ठ भूमि भी हमारे ही
  द्वारा सृजित है ।
  कर्मों पर ध्यान दे रे बन्दे
  जो आज तू करता है
 वही तेरा कल बनता है “


“ बड़ी कमबख़्त है ये ज़िन्दगी भी
 देखने वाले के लिये हसीन ख़्वाब
जीने वाले के लिए जंग है ज़िन्दगी”


“ किराये के मकान जैसी है
  ये ज़िन्दगी भी
  कब ख़ाली करनी पड़
  जाये कौन जानता है “

“दिया है,प्रकाश है ,साँस है
तभी तक आस है
वरना मिट्टी है ,और राख है “


 “ना शिकवा करता हूँ ,
ना शिकायत करता हूँ
मैं वो श्क्स हूँ जो बेरूखियों
के जहाँ में ,वफ़ा की इबादत करता हूँ “

“ज़िन्दगी के सफ़र में मुसाफ़िर
बनकर रहता हूँ ,
जीता हर लम्हे को हूँ
शिकवा -शिकायतों से दूर रहता हूँ “

“भाग्य को कोसना छोड़ दे बन्दे
तू स्वयं का भाग्यविधता है “




“मोहब्बत खुदा है “

“मोहब्बतों की डोर से बँधे हैं
        हम सब
मोहब्बत ना होती तो हम बिखर
 जाते तितर-बितर हो जाते “

“चाहतों की भी एक फ़ितरत है
चाहता भी उसे है ,जो नसीब में
     नहीं होता”

कहते हैं की मोहब्बत में इंसान खुदा हो जाता है
    खुदा हो जाता है शायद इसीलिए सबसे
             जुदा हो जाता है ।

“ना जाने क्यों लोग मोहब्बत को बदनाम
किया करते हैं ,मोहब्बत तो दिलों में पनपा करती है
         मोहब्बत के नाम पर क्यों ?
        क़त्ल ए आम किया करते हैं “

“मोहब्बत तो रूह से रूह का मिलन है
मिट्टी का तन सहता सितम है “

“मोहब्बत तो जलते हुए चिराग़ों
     में शमा बनकर रहती है ,
जितनी जलती है उतनी ही पाक
        हुआ करती है “

“मोहब्बत के चिराग़ों के हौसलें भी
क्या ख़ूब होते है , आँधियाँ आती हैं
तूफ़ान आते हैं सब स्वाहा हो जाता है
पर मोहब्बत के चिराग़ रूहों में बड़े शान से जलते
रहते हैं “

मोहब्बत ख़ुदा है तभी तो ज़माने से जुदा है
मोहब्बत खुदा की बखशी हुई नियामत है
जो हर किसी को नसीब नहीं होती ।

मोहब्बत की आग से जो ख़ुद को रोशन करता है
वो आबाद है ,परन्तु जो आग संग खेलता है
 उसको जलकर राख हो ही जाना पड़ता है ।









आओ अपने -अपने घरों की रौनक़ें बड़ायें “

👶👧🏼आओ अपने -अपने घरों
   की रौनेकें बड़ायें
   दीवारों पर लगे जाले हटायें
   धूल मिट्टी की परतें हटाएँ ।”

    🧚‍♀️खिलौनों से घर भर जाएँ
    गुड्डे-गुड़िया ,राजा -रानी की
    कहानियाँ सुने सुनायें🧜‍♀️
    कहीं रेडू चलाएँ ,
   लट्टु घुमाये ,लट्टु घुमा-घुमा कर
   सारी दुनिया के चक्कर लगायें
   धरती पर रेंगते -रेंगते बड़े हो जायें
   जिस धरती पर गिर -गिर के सम्भले
    सम्भलते -सम्भालते आज समाज को
   सम्भालने लगे ,आसमा की ऊँचाइयाँ छूने
   लगे हैं ,उस धरती माँ से जुड़े रहें
   आगे बड़े ,परन्तु आगे बड़ने की होड़ में
   अपनी माओं को ना भूल जायें
   एक जन्म देने वाली ,पालना करने वाली
   और एक धरती माँ
  इनका ना अपमान करें ,
  जिनकी ऊँगली पकड़ तुमने
  सम्भालना सीखा ,जिनकी शिक्षाओं
  ने तुम्हें अच्छे संस्कारों से सींचा
 उस माली को ना भूल जाना जिस धरती माँ
की गोद में गिर -गिर के सम्भले
उस माँ से जुड़े रहना
जाओ बच्चों आसमान की ऊँचाइयाँ छूना
परन्तु लौट के घर को आना
ये मतायें आज भी तुम्हारी राह देखती है
कोई फिर से मिट्टी के घर बनायें
माँ के हाथ की सुखी रोटी भी प्रसाद बन जाये ।












“ कन्या दान ,अभिमान ,सम्मान “

🎉💫घर में शादी का माहौल था , चार दिन बाद बहन की शादी है ,भाई को चिंता हो रही थी कहीं कोई कमी ना रह जाये ,
जबकि भाई अपनी बहन से दो साल छोटा था ,लेकिन बहन की शादी के समय था ,इसलिये शायद थोड़ा ज़्यादा समझदारी की बातें करने लगा था ।

  🎉🎉  घर पर दिन  भर मेहमानों का आना जाना लगा रहता था,कभी कोई चाचा ,मौसा ,ताऊजी सभी को अलग -अलग ज़िम्मेदारी सौंप दी गयी थी  ,सभी पूरी तन्मयता से बेटी की शादी की तैयारियों में लगे हुए थे ।
रात्रि का भोजन हुआ था ,सभी बैठे थे , कौन क्या पहनेगा सभी अपनी -अपनी पसन्द बता थे ।
तभी पापा जी बोले ,तुम सबको अपनी -अपनी पड़ी है ,और भी बहुत काम हैं , कितने लोगों को बुलाना है ,फ़ाइनल लिस्ट तैयार करो ,किसको क्या देना है सब लिखो , तभी भाई बोला किसको क्या दोगे बस देते रहो।
पापा जी बोले बेटा बात देने की नहीं होती ,बात तो शगुन की है ,ये सब रीत -रीवाज हैं इन्हें निभाना ही पड़ता है ।
भाई थोड़ा भावुक हो गया ,बोला पापा नहीं पापा  हम अपने जीवन की अनमोल चीज़ अपने दिल का टुकड़ा दे रहे हैं
,मैं अपनी बहन आप और मम्मी अपनी बेटी दे रहे हैं ,अपना सब कुछ तो दे रहे हैं ,अपना सब कुछ अपने कले…

“आग है लगी हुयी “

जिधर नज़र दौड़ायी
 नज़र आया बस कूड़ा ही कूड़ा
 कूड़े के ढेर पड़े हुए हैं
 जगह -जगह ......
 आग लगी हुई है
 चमकते चेहरों पर जब
 नज़र टिकती है ........
तब नज़र आती है एक आग
आग विचारों रूपी
कूड़े के ढेरो की आग
कूड़ा बस कूड़ा ही कूड़ा
जब गहरायी में उतरा तो
नज़र आयी गंदगी ही गंदगी
गन्दगी में पनपते ज़हरीले जीवाणु .....
कीचड़ !कीचड़ में खिलते हुए नक़ली कमल
दिखावटी कमल ,सुगन्ध रहित, पुष्प
उजले वस्त्र,मैले मन
खिलते बगीचों की गहरायी में दलदल
का अन्धा कुआँ
अंतहीन ,लोभ ,भ्रष्टाचार का दलदल
चंद पलों की आनन्द की चाहत में
अँधेरी गुमनाम गलियों में भटकता मानव
बाहर भी कूड़ा , मन के अंदर भी कूड़ा
सिर्फ़ तन को चमकाता ,सजता ,सँवरता
आज का मानव ,बस -बस करो
साफ़ करो ये गन्दगी,
अमानवीयता के अवग़ुणो को जला कर राख करो
बाहर  और भीतर सब साफ़ करो ।



“ ना जाने क्यों भटकता रहता हूँ “

दिन भर दौड़ता रहता हूँ
सुकून की तलाश में ....

सुख की चाहत में
दर्द से सामना करता रहता हूँ
दुखों से लड़ता रहता हूँ

आधी उम्र बीत गयी
सुखों को सहेजने की कोशिश में
जो सुख -शान्ति मिली भी
उन्हें भी ढंग से जी नहीं पाया

सारी उम्र सहेजता रहा ख़ुशियाँ
उन्हें जीने की चाह में
मैं दर्द जीवन में जीवन जीता चला गया

ये मुस्कराहट भी कितने सुन्दर भाव है
चेहरे पर आते ही सारे दर्द छिपा लेती है

अब मैं आज जो है ,उसको जीना सीख गया हुआ हूँ
जो वर्तमान है वही ख़ूबसूरत है ,सत्य है
भविष्य की चिंता में अपना आज खराब नहीं करता
अपने आज को ख़ूबसूरत बनाओ
कल ख़ुद ब ख़ुद ख़ूबसूरत ख़ुशियों भरा हो जाएगा ।



🥀"अक्षय अनन्नत सम्पदा "🥀☘️🌳🌳

🌍🚶‍♀️🏃🏻‍♀️जीवन - मनुष्य और संसार  ............
          ये सृष्टि , सृष्टि में अनेकों ग्रह ....🌕🌝🌒🌏
   इस सृष्टि का सबसे सुंदर ग्रह "पृथ्वी "
परमात्मा ने जब इस सृष्टि की रचना की ,हम मनुष्यों के लिये जो परमात्मा के ही अंश हैं यानि परमात्मा की संताने .....जिस प्रकार एक माता -पिता अपनी संतानों के सुंदर जीवन के लिए व्यवस्था करते हैं ..........
परमशक्ति ,परमात्मा द्वारा पृथ्वी नाम के इस ग्रह को असंख्य सुविधाओं से भर दिया गया  ,प्रकृति में
इतनी सुन्दर व्यवस्था की गयी है ,कि प्रकृति की अनमोल सम्पदाओं के भण्डार कभी ख़ाली नहीं हो सकते ।

सोचने -समझने की अनुपम भेंट ,जिसे हम बुद्धी कहते हैं ।
अच्छा और बुरा परखने की शक्ति .....
प्रकृति की अनमोल सम्पदा, धरती पर परमशक्ति  द्वारा असंख्य खनिज पदार्थों की देन ......

"अविष्कार आव्य्श्क्ता की जननी है "प्रग्रति उन्नति का सूचक है ।
परंतु उन्नति के नाम पर प्रकृति से इतनी अधिक छेड़छाड़ भी उत्तम नहीं कि प्रकृति का स्वरूप ही बिगड़ जाये ।

मेरा आज का विषय है , जबकि प्रकृति द्वारा इस सृष्टि पर सम्पूर्ण व्यवस्था की गयी है इसके बावजूद …

" प्रकृति अनमोल सम्पदा "

🥀🥀  ☘️🍀🌲☘️
    मीठी -मीठी सी शीतल हवाओं का झोंका
    सर्दी के मौसम को अलविदा कहती
    सूर्य की तेज़ ,तपिश का एहसास
    प्रातःक़ालीन शांत वातावरण में
    प्रकृति का आनंद लेता मन
    हरी-भरी घास का श्रृंगार
    करती ओस की बूँदे
    शांत वातावरण
    पक्षियों के चहकने
    की मीठी आवाज
    मानों वातावरण में
    गूँजती संगीत की मधुर तान
    प्रकृति स्वयं में ही सम्पूर्ण
    स्वयं का शृंगार करती 🎉🎉
    दिल कहे बस यहीं ठहर जाये पग
    भागती-दौड़ती ज़िन्दगी से अब थक गया है मन
    हरी -भरी घास पर बैठ कर यूँ ही बीत जाए जीवन
   जाने क्यों भगता -दौड़ता रहता है मन
   प्रकृति में निहित है जीवन का सम्पूर्ण आनंद
   प्रकृति से ना छेड़-छाड़ करो
   उसमें ना ज़हर घोलो
   प्रकृति है अमुल्य सम्पदा
  अनमोल धरोहर प्रकृति का संरक्षण करो ।🌸🌹🥀🥀☘️🍀



🎉🎉🎉🌺🌺 🎉" हाँ मैं औरत हूँ 🎉🌺🌺🏡☕️🏡📖📖🌹🌹🎉🎉

🌺 हाँ मैं औरत हूँ 🌺
मुझ बिन धरती का
अस्तित्व अधूरा है ,
कोई मुझे कुचलता है
तो इसमें मेरा क्या दोष .......
निर्दयी हैं वो ,पापी हैं वो 🌺
क्रूर हैं वो ,
रावण या कंस से भी घिनौने हैं वो
जो अपने ही बाग़ों में खिले गुलाबों
को , कलियों को कुचलते हैं
हाँ मैं औरत हूँ मुझसे ही महकता
सरा जहाँ है ,मैं ही तो सारे जहाँ की 🌺
रौनक़ हूँ ।🌺
मैं स्वयं सिद्धा हूँ ,स्वयं में सम्पूर्ण हूँ ।🌸
मुझमें आत्म बल की सम्पूर्णता है 🎉🎉

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

रंगों के त्यौहार होली की शुभकामनायें 🌺🌹

💐 होली की शुभकाममनाओं संग
  आओ आज हम रंगो का त्यौहार होली
  मनायें ।🥀

🌺  रंग ऐसा लगायें इस होली की वो
  रंग कभी ना छूटे ।
  परस्पर प्रेम की ऐसी पिचकारी चलायें
  कि दिलों के सारे मैल धूल जायें ।
  भाईचारे के रंग में सब रंग जायें ।🌺

  सब धर्मों का मर्म एक ,मक़सद एक ,🎉
  जो प्रेम ,अमन और शांति का पाठ पढ़ायें ।

 अमानवीयता के भद्दे रंगों से स्वयं को ना
 भद्धा और अभद्र बनाये ।
🌸🌸 आओ इस होली रंगों के त्यौहार में अमन -चैन
संग भाईचारे के रंग में सब रंग जाये 🌸🌸।  

🌹🌺🥀ऐसा रंग चढ़े इस होली कि विश्व कौतुम्बकम
का सपना सच हो जाये ।🥀🌹🌺🌸
आप सभी को होली की शुभ कामनाए ।🌸🌺🌹🥀🎉🎉


"अरमानों का तेज़ाब"

डरता हूँ ,कहीं मुझमें पनपता
तेज़ाब मुझे ही स्वाहा ना
कर डाले ।
तेज़ाब मेरे अधूरे सपनों के
फड़फड़ाते अरमानों का तेज़ाब
अरमानों के पंखों में
सपनों की उड़ान
फड़फड़ाते पंखों से
जब -जब भरने लगता हूँ उड़ान।

मध्य में टकराते हैं ,कई व्यवधान
खोजता हूँ कई समाधान

फिर भी मंज़िले नहीं होती आसान
दिल में जलता अरमानों का तेज़ाब
जो करता रहता है ,हर क्षण मुझे बेताब
जलता रहता हूँ ,अपने ही अरमानों के
तेज़ाब में ,
डरता हूँ ,
कहीं इस तेज़ाब से मेरा
ही ना घर जले ,यह तेज़ाब मुझे ही ना छले
अपने आरमानों के पंखों को
धीमे -धीमे ही सही आगे बड़ाता रहता हूँ
धीमे -धीमे ही सही बहुत आगे निकल आया हूँ
अरमानों के तेज़ाब को अब थोड़ी ठंडक मिलने
लगी है ।
आत्म संतुष्टि का धन जब से मैंने पाया है
मेरा जीवन बन गया शीतल छाया है
अब तेज़ाब से मुझे डर नहीं लगता
क्योंकि अब  अनियंत्रित अरमानों का आब
समा चुका है ,समुन्दर की शांत लहरों में ।











"परिवर्तन शाश्वत है "

परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
परिवर्तन ना होने पर जड़ता का
अनुभव होने लगता है ।
जड़ता में सुन्दरता का क्षय होना स्वाभाविक है ।

मौसम में परिवर्तन इसका शाश्वत उदहारण है ।
मौसम में परिवर्तन होता है तो ,प्रकृति खिलती है
फ़सल लहलहाती है ।

 फलतःपरिवर्तन शुभ का संकेत है
 वस्तुतः परिवर्तन सही दिशा में हो ।

 परिवर्तन में नवीनता भी निश्चित है
 नवीनता का स्वागत करें ,मर्गदर्शन करें

आवयश्क नहीं जो कठिन है ,जटिल है वही
सही है ।
कभी -कभी सरलता से भी अच्छे और महत्वपूर्ण
प्रश्न हल हो जाते हैं , सरलता से कही बातें भी उत्तम
दर्जे की हो सकती हैं ।
सदैव एक जैसा रहने पर जीवन बोझिल
सा लगने लगता है
जीवन में जड़ता आ जाती है
परिवर्तन सही दिशा में शुभ संस्कारों के संग
है तो ,उत्तम संकेत हैं ।

सबकी स्वयं की सोच है
किसी को सरलता से मिलता है
किसी को कठिनता से......
कभी कभी सरलता से भी बड़े -बड़े अविष्कार किए जाते हैं
ऊँची और सफल मंज़िलों को प्राप्त किया जा सकता है ।

परिवर्तन को स्वीकार करो
स्वागत करो ,सम्मान करो ,मर्गदर्शन करो ।।

मोहब्बत किसी भी मनुष्य का मूल स्वभाव है "

🎉🎉🎉🎉🌺🌺🌺🌺🌸🌸🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷😊

"मैं मोहब्बत हूँ
किसी भी मनुष्य का मूल स्वभाव हूँ "

मैं मोहब्बत जीती हूँ 😍
एहसासों में ,जज़्बातों में

मोहब्बत का कोई मजहब नहीं
मोहब्बत तो हर दिल की भाषा है ❤️
शब्द नहीं ,अर्थ नहीं ,
निस्वार्थ समर्पण है
दुआओं में ,दर्द में
क्रन्दन में ,क्रोध में
उम्र का बन्धन नहीं
रिश्तों की मोहताज नहीं
उपहार नहीं ,व्यापार नहीं
भावों में जज़्बातों में
मैं मोहब्बत हूँ ,मैं किसी भी
मनुष्य का मूल स्वभाव हूँ
मोहब्बत से ही सींचित
प्रफुल्लित रचना रचता संसार है
विश्व कौटुमबकम का पढ़ाता पाठ हूँ
मैं वो गीत हूँ ,जिसे हर कोई गुनगुनाता है
साज अलग हैं , परन्तु सुरों पर सजते गीतों के
मक़सद वही हैं , बोलना हर कोई चाहता
मोहब्बत की भाषा है ।
साजों-साज से प्रवाहित तरंगों का
मक़सद मोहब्बत है ।
जीवन की दौड़ में मोहब्बत वो दवा है
जो हर रिश्ते पर मरहम लगा उसको सवाँरती है ।

मोहब्बत ही तो हर मनुष्य का वास्तविक स्वभाव है ।







"आज और कल"

"आज और कल "


      लोग कहते हैं ,की,आज कल से
      बेहतर है ,मेरा  तो मनाना है ,कि जो
      कल था ,वो आज से बेहतर था ।

      वो कल था,जब हम खुले आंगनो में
      संयुक्त परिवार संग बैठ घण्टों क़िस्से
      सुनते -सुनाते थे , बुर्जर्गो की हिदायतें
      बातों -बातों में कहानियाँ ,मुहावरे,लोकोक्तियाँ
      के माध्यम से हमारी पीढ़ी का मार्गदर्शन होता था ।

      खुले मैदानों में दिन भर जी भर खेलते थे
      साँझ होने पर ,ज़बरन घर पर लौटाया जाता था
      शारीरिक,और मानसिक दोनो ही व्यायाम
      हो जाते थे।
      याद है मुझे ,वो रस्सी कूदना ,कबड्डी खेलना
      पिट्ठु,गिल्ली डंडा , खो -खो ,छूपन छिपायी ,
      ऊँच-नीच व घर -घर इत्यादि खेलना
      मिट्टी में गिरते सम्भलते थे , कोई फ़िक्र ना थी
      कपड़े मैले भी होते थे ।

      मिट्टी के कच्चे घरों में सुख ,चैन की नींद सोते थे
      दीवारें भले ही कच्ची होती थीं ,परन्तु रिश्तों की
      डोर पक्की होती थी ।
      आज घरों की दीवारें भले ही मजबूत होती हैं
      परन्तु रिश्तों की डोर बहुत ही कच्ची होती जा रहीं हैं ।

     हम कभी भी अ…

🎉🎉 नम्हो वीणा वादिनी 🎉🎉

🌺🌺🎉 नम्हो वीणा वदीनी 🌺🌺🎉


🎉🎉नम्हो वीणा वादिनी
नम्हो हंस वहिनी
नम्हो शान्ति देवी ,सरला ,निर्मला
जिस प्रकार आपकी वीणा से निकलते

सुर सम्पूर्ण आभा मण्डल को पवित्र करते हैं
सुख ,शान्ति,करुणा,और प्रेम का सन्देश देते रहते हैं
तो हे ,सरस्वती माता ,हमें भी ऐसा वर दो

की हम मनुष्यों की मन ,वाणी ,वचन से जो भी स्वर
निकले वो मीठा ,मधुर सुख ,शांति ,का सन्देश लिये
सबके हित में हो ।
नम्हो वीणा वादिनी ।🎉🎉🎉🎉🎉🎉

🎉🎉" शून्य का शून्य में वीलीन हो जाना 🎉🎉

मनुष्य जीवन में ,तन का अस्तित्व राख हो जाना ,आत्मा रूपी शक्ति ,जिससे मनुष्य तन पहचान में आता है , यानि         मनुष्य का अस्तित्व धरती पर तभी तक है जब तक तन में आत्मा की ज्योत रहती है ।
दिव्य अलौकिक शक्ति जिससे आप ,मैं, हम ,तुम  और सम्पूर्ण प्राणी जगत है , सब के सब  जिस रूप में दिखाए देते हैं वह सब  एक आकार है ,या यूँ कहिए ...   ब्रह्माण्ड में व्याप्त अलौकिक शक्ति ,जिसका तेज़ इतना अधिक और उसकी शक्ति  असीमित है ,उस अलौकिक शक्ति में से कुछ शक्तियाँ विखंडित होकर के अपना अस्तित्व खोजने लगीं उन शक्तियों की शक्तियाँ भी असीमित ......उन शक्तियों ने अस्तित्व में आने  के लिये पाँच तत्वों से निर्मित एक तत्व बनाया, धरती पर निवास हेतु उस तत्व की संरचना बख़ूबी की गयी .......उसके पश्चात् उसमें आत्मा रूपी दिव्य जोत को प्रवेश कराया गया , वहीं से से मनुष्य  तन अस्तित्व में आया होगा ।    क्योंकि वह शक्ति स्वयं में ही इतनी शक्तिशाली है कि उस शक्ति ने स्वयं की शक्तियों का उपयोग करते हुए ,स्वयं के लिये धरती पर सब सुख सुविधाओं की भी व्यवस्था की , उन्हीं शक्तियों के तेज़ ने संभवतया वंश वृद्धि को …

" आत्म यात्रा "

दो अक्षर क्या पड़ लिये ,मैं तो स्वयं को विद्वान समझ बैठा ।
वो सही कह रहा था ,चार किताबें क्या पड़ लीं अपने को ज्ञानी समझ बैठे ।
उनका क्या जिन्होंने शास्त्रों को कंठस्थ किया है ,जिन्हें वेद ,ऋचाएँ ज़ुबानी याद हैं ।
ज्ञानी तो वो हैं ,जिन्होंने अपना सारा जीवन शिक्षा अद्धयन में लगा दिया जिनके पास शिक्षा  की डिग्रियों की भरमार है ,
निसंदेह बात तो सही ,जिन्होंने अपना सारा समय,अपना सारा जीवन अद्ध्य्नन कार्यों में लगा दिया ।

    दिल में ग्लानि के भाव उत्पन्न होने लगे, बात तो सही है , मैं मामूली सा स्नातक क्या हो गया, और शास्त्र लिखने की बात कहने लगा ,बात तो सही थी ,कौन सी डिग्री थी मेरे पास कोई भी नहीं .....चली लेखिका बनने .....
कुछ पल को सोचा मामूली सा लिखकर स्वयं को विद्वान समझने का भ्रम हो गया था मुझे ।
भले ही मैं विद्वान ना सही पर ,परन्तु मूर्ख भी तो नहीं ।

परन्तु बचपन से ही चाह थी , अपने मनुष्य जीवन काल में कुछ अलग करके जाना है ,जीवनोपर्जन के लिये तो सभी जीते हैं ,बस यूँ ही खाया -पिया कमाया जमा किया ,और व्यर्थ का चिंतन ,जब ज्ञात ही है कि जन्म की ख़ुशियों के संग ,   जीवन की कड़वी स…