किस्मत की  छड़ी 
 सुन्दर सभ्य स्वर्ग तुल्य समाज की चाह रही है. 
 परीक्षाफल की समीप घडी है,
वोटरों के हाथ नेताओं की किस्मत की छड़ी है ,
रजनीतिञ कुर्सियों की दिल की की धड़कन बड़ी है।
   
अड़चन बड़ी है,कौन होगा मेरा  सही उम्मीदवार ,
बेसब्री से हो रहा इंतजार 
कुर्सी की तो बस इतनी सी चाह है 
जो हो मेरा उम्मीदवार
वो हो ईमानदार,वफादार  

अपनी तो सभी करते है नैय्यापार,
पर नेता वही जो स्वार्थ  से ऊपर उठकर करे देश का करे  उद्धार। 
 भाईचारा,परस्पर प्रेम हो जिसका व्यवहार ,
सुन्दर सभ्य स्वर्ग तुल्य समाज का हमारा सपना हो साकार।  

आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...