"इस वर्ष विजयदशमी पर, कलयुगी रावणों का अंत करने का निर्णय लें।


*विजय दशमी*
" सच्चाई की बुराई पर जीत का पर्व"
 सतयुग में जब अहंकारी रावण का अत्याचार बढ़ता जा रहा था ,रावण जो परम् ज्ञानी था ,परन्तु अपने अहंकार के मद के नशे में चूर रावण दुष्टता की चरम सीमा को पार करता जा रहा था ,धरती पर साधु,सन्यासी,सरल ग्रहस्थी लोग रावण के अत्याचारों से हा-हा कार करने लगे ,तब धरती को राक्षस रूपी रावण से  पापमुक्त करने के लिये, परमात्मा रामचन्द्र को लीला करनी पढ़ी ,और श्री राम ने लीला करते हुए ,अपनी भार्या सीता को रावण की कैद से आजाद कराने के लिये ,भाई लक्ष्मण ,हनुमान, सुग्रीव,जाववंत, आदि वानर सेना के सहयोग से ,रावण रूपी राक्षस से धरती को पाप मुक्त कराया ।
तभी से आज तक रावण, कुंभकर्ण,और मेघनाद के पुतलों को जला कर गर्वान्वित महसूस किया जाता है ।
 
आज कलयुग में में भी इस विजय दशमी की बहुत महिमा है ,अच्छी बात है । परन्तु कब तक ?
सतयुगी रावण तो कब का मारा गया । प्रत्येक वर्ष रावण के पुतले को जला कर हम मानवीय जाति शायद यह साबित करना चाहती कि रावण तो बस एक ही था ,और तब से अब तक रावण का पुतला जला कर हम बहुत श्रेष्ठ काम कर रहे हैं ,अजी कुछ भी श्रेष्ठ नहीं कर रहे हैं आप लोग , अगर हिम्मत है तो कलयुगी रावणों से धरती को पाप मुक्त करके दिखाओ।
आज कलयुग में मानव रूपी मन में कई रावण पल रहे हैं ।आज भाई-भाई का दुश्मन है ,परस्पर प्रेम के नाम पर सिर्फ लालच ही भरा पड़ा है । कोई किसी को आगे बढ़ते देख खुश नहीं है ,हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में एक दूसरे को कुचल रहे हैं ।
आज कलयुग में एक नहीं अनगिनत रावण धरती पर विचरण कर रहे हैं ,अगर करना है तो इन रावणों का अंत करो
आज के युग मे सिर्फ रावण के पुतले फूँकने से कोई लाभ नहीं होगा।
और कोई भगवान नाराज़ नहीं होंगे ,अगर इस वर्ष हजारों रुपये के रावण, कुंभकर्ण,और मेघनाद, के पुतले आप नही फूंकेंगे ,तो भगवान प्रसन्न होंगे।
 अगर उन्हीं रुपयों से आप किन्हीं जरूरतमंदों की सहायता करेंगे। किसी परिवार में सच्ची शिक्षा का बीज बोयेंगे किसी को जीवन में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करेंगे ।
*विजयदशमी का पर्व *मनाईये  अवश्य मनाईये पर  सर्वप्रथम दिलों में परस्पर प्रेम को दीप जलाइए ।
*अपनत्व की फ़सल उगाओ ,वैर ईर्ष्या, निन्दा, हठ, क्रोध आदि राक्षसी वृत्तियों के पुतले हर वर्ष जलायें ।
बंद करें अब ये पुतले फूंकने का खेल आज से प्रत्येक वर्ष "विजयदशमी" पर अमानवीयता ,और अहंकारी रावणों रूपी विचारधाराओं का अंत कर उनके पुतले फुंकिये ।
  

आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...