*चेहरे से उदासी का पहरा हटाओ*

मेरे नयनों का लगा
मुझ पर ही पहरा
आइने में जो देखा
स्वयं का चेहरा ।

मासूम से मुखड़े पर
उदासी का पहरा
भाता नहीं हमको
उदास चेहरा।

मुस्कराहट का थोड़ा सा
चेहरे पर मल दे गुलाल
करणों में कर्णफूल तो डाल

घुंघराली लटों को
संवार
कर थोड़ा श्रृंगार
मृग नयनी इन नयनों
 में काजल तू डाल।

पैरों में पायल की खनक
तू डाल, हिरनी सी मतवाली
तेरी है चाल ।

गौरी तुम वैसे ही लगती कमाल
उस पर श्रृंगार की आदत तू डाल

तुझसे ही दुनियां में रंग बेहिसाब
उस पर तुम बातें भी करती बेमिसाल

शब्दों के मंथन से विचारों का
अमृत निकाल इस दुनियां को
दे फिर मालामाल ।
अपने औचित्य का डंका बजा
दुनियां में अपने अस्तित्व का झण्डा फहरा।






आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...