वक्त का सिलसिला

वक्त है कोई भी हो बीत ही जाता है 
और यह भी सत्य है गया वक्त लौट 
कर नहीं आता ।
वक्त करवट बदलता है 
तभी तो दिन और रात का सिलसिला 
चलता है ।
मनुष्य को वक्त के हिसाब से ढलना पड़ता है 
और चलना पड़ता है , नहीं तो वक्त स्वयं सिखा 
देता है ।
वक्त रहते वक्त की कद्र कर लो मेरे अपनों 
वक्त अपने ‌‌‌‌‌ना होने का एहसास खुद कराता है 
वक्त हंसाता है रुलाता है डराता है गुदगुदाता भी है  
वक्त  रहते वक्त पर कुछ काम कर लेने चाहिए 
सही वक्त निकल‌ जाने पर काम का अर्थ ही बदल 
जाता है ।
व्यर्थ ना करो वक्त को, वरना वक्त अपना 
अर्थ स्वयं बताता है ।
वक्त तो वक्त है सही वक्त पर किया गया कार्य
वक्त की लकीरों पर अपना नाम सदा -सदा के 
लिए अमर कर अंकित कर जाता है ।



उद्देश्य मेरा सेवा का पौधारोपण



उद्देश्य मेरा निस्वार्थ प्रेम का पौधारोपण 

अपनत्व का गुण मेरे स्वभाव में 

शायद इसी लिए नहीं रहता अभाव में 

 सर्वप्रथम खड़ा हूं पंक्ति में 

समाज हित की पौध लिए

श्रद्धा के पुष्प लिए भावों की 

ज्योत जलाएं चाहूं फैले च हूं और 

उजियारा निस्वार्थ दया धर्म

का बहता  दरिया हूं बहता हूं निरंतर 

आगे की ओर बढ़ता सदा निर्मलता 

का संदेश देता भेदभाव का सम्पूर्ण 

मल किनारे लगाता सर्व जन 

हित में उपयोग होता सर्वप्रथम खड़ा हूं पंक्ति में 

निर्मलता का गागर भरता ।







आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...