प्रकृति ने स्वयं के श्रृंगार की भी
क्या खूब अनुपम व्यवस्था की है
रंग-बिरंगे पुष्पों से धरती मां का
आंचल भर दिया है ,मानों धरती मां को
रंग बिरंगे पुष्पों वाली चुनरिया ही उड़ा दी हो
गुलाब, चंपा ,चमेली गेंदा आदि अनेक पुष्पों की
सुगंधी ,वाह इत्र की भी पूर्ण व्यवस्था
वृक्षों की लताएं मानों जुल्फें बनकर लहरा रही हों
फलों से लदे वृक्ष मानों बूटी वाली झालर
पक्षियों की सुमधुर कुंके कानों में रस घोलती
अनगिनत वाद्य साधनों की प्राकृतिक
सौम्य सुमधुर धुन
मन मोहिनी कोयल की मीठी बोली वाह क्या
मानों प्रकृति ने अपने संगीत की भी पूर्ण
व्यवस्था की हो
बहुत खूब हैं प्रकृति तेरे भी गुण
क्या खूब किया है तुमने
धरती मां का श्रंगार
सौम्य चंचल ,मनमोहनी प्रकृति तेरे रूप को देख मैंने तेरा नाम रख दिया मनमोहनी



तकदीर



सजदा


आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...