* जैसी आज्ञा *

 
 आज हमारे पितामह आने वाले हैं !
       जाने आज  क्या घोषणा करेंगे ।
       
     जब भी आते हैं ,पितामह !
 कुछ ऐसा ऐलान कर जाते हैं ,पत्थर को लकीर ... एक दिन कहेंगे सांस लेना छोड़ दो आक्सीजन की कमी हो रही है,वेंटिल्टर में कमी हो रही है ,तब बताओ क्या करेंगें ,सांस लेना छोड़ देंगें।

  पितामह आज भी आये ,बोले घर से बाहर नहीं निकलना ,बाहर कोई राक्षस घूम रहा है ,बाहर निकलोगे तो वो राक्षस तुम्हें खा जायेगा, ये राक्षस आया कहां से ,पितामह कुछ तो करो।
 अब तो किसी अर्जुन का इंतजार आए , एकलव्य का अंगूठा कट गया , कर्ण जैसे दानवीर भी अब नहीं रहे ,सब तस्वीर चाहते हैं ।
  अम्मा इन पितामह में गजब का तेज है ,वो जब - जब टेलीविजन पर आकर कुछ बोलते हैं तब सब प्रजवासी बड़े धैर्य पूर्वक उनकी बातों को सुनते हैं ।

कितना सोते हो राजू तुम, इतना तो
कुंभकर्ण भी नहीं सोता था ।

राजू आपनी अम्मा से ,लगता है ,आपने रामायण कभी ढंग से नहीं देखी।

अम्मा ,अब तुम हमें रामायण के बारे में बताओगे जितनी रामायण, हमने देखी और सुनी है ,ना बेटा ,उतनी तो जिन्दगी में किसी ने भी नहीं सुनी होगी।
तुम्हारी नानी, हमें दिन रात रामायण के चरित्रों के बारे में बताती रहती थी ।
मुझे तो वो सीता कहती थीं इसलिए उन्होंने मेरा नाम सिया रखा था।

अच्छा अम्मा ,तो आप सीता माता और पिताजी हमारे राम ।

मां फिर तो मैं आपका लव हुआ ,और छोटी बहन कुशा.......

अम्मा हो..... अम्मा आप अपने को मंदोदरी समझती हो, और पापा (रावण)  ,मां जोर से चिल्लाई ,शर्म करो ,कलयुग भयंकर कलयुग आ गया है ।

मां मैंने क्या गलत कहा ,जब आपने मुझे कुंभकर्ण कहा तभी तो  मैंने कहा।

चुप हो जा मूर्ख।
अच्छा अम्मा में उठ जाता हूं ,फिर भूख लगेगी और आपको खाना बनाना पड़ेगा ।
लेकिन कुंभकर्ण तो साल में एक ही बार उठता था ,फिर बहुत सारा खाना खाता था ,और सो जाता था।

राजू व्यंग करते हुए, अम्मा मैं इसीलिए तो ज्यादा सोता हूं ,जितना कम सोऊंगा उतनी भूख कम लगेगी ।
और आप मेरे हिस्से का भोजन भूखों को खिला देना ।
राजा बेटा, मैंने तुम्हारा नाम राजा रखा था ,क्योंकि हम चाहते थे तुम राजा की तरह रहो ,राजा की तरह अपने कर्तव्यों का पालन करो ,आलस में अपना समय व्यर्थ  न करो ।
इस सुन्दर समाज की स्थापना का भार तुम्हारे कांधो पर है पुत्र ।
जैसा तुम व्यवहार करोगे कर्म करोगे वैसा ही समाज निर्माण होगा ।
राजा जैसी आज्ञा माता जी, आगे से आप हमें कुंभकर्ण कहने की गलती मत करना ।
हां पुत्र ,हम इस अपराध की क्षमा मांगते हैं ,तुम हमें जो सजा देना चाहो ,दे सकते हो ।

नहीं माता जी ,ऐसा कैसे हो सकता है आप हमारी माता है आपको हमें कुछ भी कहने का अधिकार है
हे माता , आप अपने राजा बेटे के लिए स्वादिष्ट सा भोजन परोसिए हम अभी आपकी सेवा में हाजिर होते हैं ।

हमारा क्या है ,हम तो समाज के लिए हैं ,समाज की भलाई आपकी आज्ञा हमारा तो बस यही धर्म है।


आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...