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***आखिर कब तक**

आखिर कब तक **

बहुत हो गया चूहे बिल्ली का खेल

ये तो वही आलम है ,घर मे शेर ,बाहर गीदड़

बड़ी-बड़ी बातें करनी तो सभी को आती है

पकड़ो -पकड़ो चिल्लाने से कुछ नही होगा

हत्यारे तुम्हारे ही घरों में घुसकर तुम्हें मार रहे है ।


वाह! वाह! मरते रहो ,मरणोपरांत तुम्हे सम्मान मिलेगा

बड़े-बड़े नेता तुम्हारी मृत्यु पर राष्ट्रीय शोक मनायेंगे

बड़ी-बड़ी योजनाएं बनेगी ,आतंकवादी यों को जड़ से मिटाने की

तुम्हारे नाम पर तुम्हारे परिवार वालों को सहायता राशी भी मिलेगी।


बस-बस-बस बस करो क्यों अपने ही देश की जड़ों को खोखला कर रहे हो ।

अब बातें करने का समय बीत गया है ,कहते भी हैं जो *लातों के भूत
होते है वो बातों से नही मानते *

तुम्हारी सादगी को तुम्हारी शराफ़त को तुम्हारी कमजोरी समझ
आँकवादी तुम पर वार-वार कर रहे है ।

आखिर कब तक कितने माँ के लाल शहीद होंगे ,

☺शिक्षा और सभ्यता ☺

☺**शिक्षा, सभ्यता ,और आधुनिकता,
शिक्षा है, तो सभ्यता आयी ,सभ्यता आयी तो आधुनिकता बड़ी।।*
☺आज की युवा पीढ़ी शिक्षित हुयी
शिक्षा के संग सभ्यता आना स्वभाविक है
उत्तम संजोग है ,सभ्यता ,तरक्की,और उन्न्ति की ऊँचाइयाँ छूना ।👍
क्या सभ्यता ,सिर्फ अत्यधिक धनोपार्जन और ब्रेंडड
वस्त्रों तक सीमित है ।
आधुनिकता की दौड़ में सब दौड़ रहे है
 लाभ के लोभ में ,संस्कारों की हानि का कोई  खेद नहीं।।

💐सभ्यता के सही मायने ही नहीं ज्ञात  अत्यधिक धनोपार्जन करना ही ,मात्र  तरक्की का सूचक नहीं ।☺ वातानुकूलित कक्ष में बैठकर कोट,पेन्ट,टाई पहनकर  रौब दार रवैया अपनाने को ही , आधुनिकता ,और सभ्यता की पहचान माना जाने लगा है
हाँ सत्य है सुविधाएं बढ़ना प्रग्रति का सूचक है ।
परन्तु सुविधाओं की आड़ में आधुनिकता
के प्रदर्शन में अपनी संस्कृति को भूल जाना
छोटों को प्यार,स्नेह,बड़ों का आदर करना भूल जाना
ऐसी सभ्यता किस काम की । सभ्यता यानि ,आचरण की सभ्यता , विचारों की विनम्रता ,शिक्षा और सभ्यता एक दूसरे के पूरक हैं ,सच्ची शिक्षा तभी सार्थक है ,जब वह सभ्य आचरण के साथ फलती फूलती है ।।
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*****स्वयं का नेतृत्व ****

💐💐   कौन किसके हक की बात करता है
    अपने कर्मों की खेती स्वयं ही करनी पड़ती है
    स्वयम ही स्वयम को प्रोत्साहित करो
    काफिले में सर्प्रथम तुम्हे अकेले ही चलना पड़ेगा
     जीत तो उसी की होती है ,जो स्वयम ही स्वयम का
     नेतृत्व करता है।💐💐

** मैंने उस वक्त चलना शुरू किया था
     जब सब दरवाजे बंद थे ,
     पर मैं हारमानने वालों में से कहाँ था
     कई आये चले गए ,सब दरवाजे बंद है
     कहकर मुझे भी लौट जाने की सलाह दी गयी ।पर ,

     मैं था जिद्दी ,सोचा यहां से वापिस नहीं लौटूंगा
     टकटकी लगाये दिन-रात दरवाजा खुलने के इन्तजार
    मैं पलके झपकाए बिना बैठा रहता ,
    बहुतों से सुना था दरवाजा सालों से नही खुला
    पर मेरी जिद्द भी बहुत जिद्दी थी ।

   एक दिन जोरों की तूफ़ान आने लगा ,आँधियाँ चलने लगी
    मेरी उम्मीद ए जिद्द थोड़ी-थोड़ी कमजोर पड़ने लगी
   पर टूटी नहीं ,नजर तो दरवाजे पर थी
   तीर कमान में तैयार था , अचानक तेज हवा का झौंका          आया मेरे चक्षुओं में कोई कंकड़ चला गया ,
   इधर आँख में कंकड़ था , उधर आँधी से जरा सा
 दरवाजा खुला ।
😢
   आँख कंकड़ से जख्मी थी ,पर मैंने निशाना स…

**आभार ब्लॉग जगत **

**आभार ब्लॉग जगत **
**मकसद था कुछ करूं, मेरी दहलीज जहां तक थी वहीं तक जाना था  ,करना था कुछ ऐसा जो उपयोगी हो कल्याण कारी हो , जिसकी छाप मेरे दुनियाँ से चले जाने के बाद भी रहे , बाल्यकाल में महान लेखकों की लेखनी ने प्रभवित  किया  देश की आज़ादी के किस्से वीर शहीदों के किस्से आत्मा को झकजोर देते। दायरा जहां तक सीमित था  लिखकर अपनी बात कहनी शुरू की , यूँ तो किसी का लिखना कौन पड़ता है ,पर फिर भी लिखना शुरू किया । धन्यवाद ब्लॉग जगत का । आज लिखने को खुली ज़मीन है । आसमान की ऊँचाइयाँ है , क्या सौभाग्य है  परमात्मा ने स्वयं हम लेखकों की सुनी शायद । आज ब्लाग जगत के माध्यम से लेखक भी सम्मानित होने लगे ।