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**नया दौर, नयी सोच **

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 "आज फिर से ये सवारी किधर चली बन -ठन के .......  ओहो ! अम्मा जी किसी को टोकते नहीं जब वो किसी जरूरी काम से जा रहा हो ।
अम्मा जी ,व्यंग करते हुए बोली,जरूरी काम -
अब तुम्हे क्या जरूरी काम है , तुम्हारे सारे काम तो तुम्हारे बच्चे कर देते हैं ,ऑनलाइन घर पर बैठे - बैठे ,तुम्हे  क्या काम है ,मै जानती हूं ।
 क्या काम है,जरा  बताओ आप तो अन्तर्यामी हो अम्मा, मुझे पता है,आपको मेरा अच्छे से तैयार होने पर शंका होती है। अम्मा बोली नहीं बेटा शंका क्यों होगी ,तेरी बेटी की शादी हो गई,और चार पांच साल में बेटे की भी हो जाएगी ,तेरी बहू आएगी , बेटा बोला मैं समझ गया की आप क्या कहना चाहती हो की मेरी उम्र हो गई है , मैं बूढ़ा हो गया हूं ,नहीं अम्मा मैं बूढ़ा नहीं हुआ हूं और ना होंगा अभी मेरी उम्र ही क्या हुई है ..... हंसते हुए बोला ।
अम्मा बोली जा जो तेरी मर्जी वो कर मेरा क्या ,
जब बहू - बेटा हंसेंगे ना तब अक्ल आयेगी .....
बेटा अम्मा के पास आकर बैठ गया ,और बोला अम्मा ,लोग क्या कहेंगे ,लोग तो कुछ होने पर भी कहेंगे और कुछ ना होने पर भी कहेंगे ।
अम्मा नवीनता आव्यशक है ,नवीनता हमारे जीवन में नया उत्…

“पुष्प और तितलियाँ “

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        मेरे सुन्दर संसार की बगिया में,
        विभिन्न रंग - बिरंगे पुष्पों की फुलवारी है
        मेरी फुलवारी में तितलियों का भी बसेरा होता है
        फुलवारी , आकर्षक ,मस्त , सुन्दर रंग - बिरंगी तितलियों को
        बहुत भाती हैं , वो प्यारी तितलियाँ , एक पुष्प से दूसरे पर इठलाती हैं
        मानों गीत - हँसी -ख़ुशी के गाती हैं , और कहती हैं ,
        तुम्हारे और हमारे जीवन में बहुत समानता है
        तुम भी अपने छोटे से जीवन काल में सबके जीने का सबब बनते हो
        और हम भी अपने छोटे से जीवन में , किसी की बगिया को महकाते हैं ,
        कभी किसी के दिल को भाते हैं , कभी कोई हमें तोड़ के ले जाता है
        कोई हार बना गले में पहनता है , कोई मंदिर में चढ़ाता है ,
        दुख में हो या सुख में मेरा तो भरपूर उपयोग हो जाता है ,
        अपने छोटे से जीवन में मेरा तो सम्पूर्ण उपयोग हो जाता है
        मैं “ईत्र “बनकर हवाओं को महकाता हूँ ,
        और धरती पर वायुमण्डल में अपना असर छोड़ जाता हूँ ।
        मैं पुष्प हूँ , में मरकर भी अमर हो …

“हौसलों का दामन पकड़ “ “

“हौसलों का दामन पकड़ “

“ तिमिर घोर तिमिर
वो झिर्रीयों से झांकती
प्रकाश की किरण
व्यथित , व्याकुल ,
पराजित मन को ढाढ़स बँधाती
हौंसला रख ए बंदे
उम्मीदों का बना तू बाँध
निराशा में मत अटक
भ्रम में ना भटक
वो देख उजाले की झलक
कर्मों में जगा कसक
नाउम्मीदी को ना जकड़
उजियारा दे रहा है तेरे द्वार
पर दस्तक
तेरा हौसला ही तेरे आगे बढ़ने का सबब
हौसलों ने उम्मीद के संग मिलकर
रचे हैं कई आश्रयजनक अचरज
तेरे हौसलों ने दिखाने हैं अभी कई बड़े- बड़े करतब ।

🌸🎉ख़ुशियाँ बाँटो 🎉🌺

🌸🎉🌟🌟🌟🌟

         “अपनी ख़ुशियाँ  तो सब चाहते हैं
            परन्तु जो दूसरों। को ख़ुशी देकर ख़ुश होते हैं
          उनकी ख़ुशियाँ दिन - प्रतिदिन बढ़ती रहती हैं “

 गाँव में दशहरे के पर्व के उपलक्ष्य  में मेला लगा था  ।
   🌟🌟गाँव वालों में बहुत उत्साह था , मेला देखने जो जाना था , सभी अपने - अपने ढंग से तैयार होकर सज -धज कर कर मेले में जाने के लिये तैयार हो रहे थे ।
 बच्चों में भी उत्साह था , आख़िर गाँव में  कभी -कभार ही ऐसे मौक़े आते थे , की सब एक साथ मिलकर कहीं जायें।

    😊😃 वैदिक और बैभव भी मेले में घूमने जा रहे थे ,दादी का पंखा टूट गया था , दादी को अब मच्छर काटेंगे ,गर्मी भी लगेगी , वैदिक को बहुत चिंता हो रही थी .. दादी का पंखा मिल जाए मेले में वैदिक की दिली  इच्छा थी .....
   साथ में दोनो के माता -पिता भी थे , वैभव और वैदिक की माओं ने सिर पर बड़े-बड़े घूँघट ओड़ रखे थे , की अचानक आगे गड्ढा आया , और दोनो माताओं के पैर लड़खड़ाये और वो गड्ढे में जा गिरी , बच्चे ज़ोर -ज़ोर के हँसने लगे .... तभी दोनो माताओं के सिर से घूँघट हटे , और दोनो झट से उठ खड़े हुई , एक दूसरे को देखत…
चित्र
“  ये धरती अपनी है , नीला आसमान भी अपना है “
  खेलने को खुला मैदान है ,आओ मित्रों खेल खेलें
  हम बन्द कमरों में नहीं रहते , हमारे खेल बड़े-बड़े हैं
  हमें रहने को खुला मैदान चाहिए , सपने देखने को
  चाँद , सितारों का जहाँ चाहिये ।