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* अमृत और विष*

*जहर उगलने वाला नहीं, ज़हर पीने वाला हमेशा महान होता   है*  *  बनना है तो उस कड़वी दवा की तरह बनिये जो शरीर  में होने वाले रोगों रुपी ज़हर को नष्ट करती है ,ना कि उस ज़हर की तरह जो विष बनकर किसी को भी हानि ही पहुंचता रहता है* * शब्दों का उपयोग बड़े सोच समझ कर करना चाहिये   कुछ लोग कहते हैं ,हम तो दिल के साफ हैं ,जो भी कहते हैं ,  साफ-साफ कह देते हैं ,हम दिल में कुछ नहीं रखते ।  अच्छी बात है ,आप सब कुछ साफ-साफ बोलते हैं ,दिल में कुछ नहीं रखते । दूसरी तरफ आपने ये भी सुना होगा कि ,शब्दों का उपयोग सोच-समझ कर करिये । "मुँह से निकले हुए शब्द "और "कमान से निकले हुए तीर"वापिस नहीं जाते ,कमान से निकला हुआ तीर जहाँ पर जा कर लगता है ,अपना घाव कर जाता है ,अपने निशान छोड़ ही जाता है ,माना कि घाव ठीक हो ही जाता है,परंतु कड़वे शब्दों के घाव जीवन भर दिलों दिमाग पर शूल बनकर चुभते रहते हैं । हमारे प्राचीन, ग्रन्थ,इतिहास इस बात के बहुत बड़े उदाहरण हैं,कि देवताओं और दानवों की लड़ाई के समय *समुद्र मंथन हुआ *उस समय समुद्र से *अमृत और *विष दोनों निकले ,कहते हैं समुद्र मंथन से निकला हुआ विष एक जल…

💐फ़लसफ़ा💐

**💐💐खिले-खिले पुष्पों से ही घर,आँगन महकते है,
   प्रकृति प्रदत्त,पुष्प ,भी किसी वरदान से कम नहीं
   अपने छोटे से जीवन में पूरे शबाब से खिलते हैं💐 पुष्प💐
   और किसी न किसी रूप में काम आ ही जाते हैं
    जीवन हो तो पुष्पों के जैसा, छोटे से सफ़र में बेहद की
    हद तक उपयोगी बन जाते हैं।💐💐

   जीवन का भी यही फ़लसफ़ा है,
  💐 बुझे हुए चिरागों को किनारे कर ,
   जलते हुए चिरागों से ही घर रोशन किये जाते हैं ।
   क्योंकि जो जलता है, वही जगमगाता है ।

 ☺☺  कभी -कभी  यूँ ही मुस्करा लिया करो
   गीत गुनगुना लिया करो ।
  जीवन का संगीत हमेशा
  मधुर हो आवयशक नहीं ।
  हालात कैसे भी हों तान छेड़ दिया करो
  सुर सजा लिया करो,गीत बना लिया करो
  जीवन एक संगीत भी है
  हर हाल में गुनगुना लिया करो ।

 चाँद में दाग है ,सबको पता है
 फिर भी चाँद ही सबका ख्वाब है
 क्योंकि चाँद में चाँदनी बेहिसाब है ।☺☺

* खिलने दो मासूम कलियों को *

*शाम के आठ बजते ही घर में सब शान्त हो जाते थे।
एक दिन न जाने भाई-बहन में किस बात पर बहस छिड़ गयी थी ,बच्चों की माँ चिल्ला रही थी दोनों इतने बड़े हो गये हैं फिर भी छोटी-छोटी बातों पर लड़ते रहते हैं ।

माँ अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही थी कि,बच्चों की बहस खत्म हो ,माँ बच्चों के पास बैठी बोली तुम्हारे पापा, और दादा जी आने वाले हैं ,और तुम्हें पता है, की उन्हें बिल्कुल भी शोर पसन्द नहीं है ,वैसे ही दोनों दिन भर के थके हुए होते हैं ।
बेटी,सान्या दस साल की और बेटा सौरभ पन्द्रह साल का ,लेकिन भाई, बहन की लड़ाई में कौन छोटा कौन बड़ा दोनों अपने को बड़ा समझते हैं ,चलो किसी तरह शांति हुयी ।
माँ बोली आज साढ़े आठ बज गये हैं ,आज तुम्हारे दादा जी और पापा को देर हो गयी है ,अब तुम दोनों शांति से बैठे रहना ,वरना सारा गुस्सा तुम दोनों पर ही निकलेगा ।

इतने मे डोर बेल बजी ,दादा जी ,और पापाजी हाथ-मुँह धो कहना खाने बैठ गये ,माँ  एक सेकंड भी देर नहीं करती थी दोनों को खाना परोसने में,क्योंकि माँ वो दिन कभी नहीं भूलती थी ,जब एक दिन खाना देर से परोसने पर माँ को दादा जी से बहुत फटकार पड़ी थी ,और दादा जी ने उस दिन खाना भी…