* वक़्त किसने देखा *

 पौता :-  अपनी दादी से ,

दादी आप आजकल मंदिर नहीं जाते , पहले तो आप मंदिर जाए बिना खाने को हाथ भी नहीं लगाते थे।

हां बिल्कुल सही कह रहे हो बेटा ,अपनी पैंसठ साल  के जीवनकाल में ,मैंने ऐसा कभी नहीं देखा की देशभर के समस्त मंदिर धार्मिक स्थल बंद हों ।

हे ,भगवान ,कैसा समय आ गया

हे राम, हे राम ,कैसा कलयुग आ गया ।

जिन्दगी में पहली बार हुआ की पूरा विश्व एक अदृश्य शक्ति जिसे तुम सब वाइरस कह रहे हो ,बाहर घूम रहा है,और हम सब जनता लोग घरों के बिलों में चूहे की तरह घुसे पड़े हैं ,डर के मारे .......
हे भगवान ,कैसा घोर कलयुग आ गया है !
हे,भगवान , हम सब के पापों को क्षमा करो ,और कोई युक्ति बताओ जिससे हम इस महामारी के राक्षस का अंत कर सकें।

दादी सच कह रही हो ,वैज्ञानिकों ने बहुत खोजें की हैं, इसपर पर भी शोध जारी है ।

दादी:- पौते से आ बेटा मेरे पास बैठ ,आ हम मिलकर अपने इसी घर को मंदिर सा पवित्र बनाते हैं ।
बेटा मेरा रोज मंदिर जाना ,मुझे एक नियम में बांध कर रखता था, जिससे कुछ क्षण तो मेरा मन भगवान में स्थिर होता था।
लेकिन अब समय आ गया है, घर को ही पवित्र बनाने का ....
बहुत भाग लिए बाहर की दुनियां में ......
अब समय है,अंदर की दुनियां में शोध करने की और सकारात्मक सोच के दिए जलाने की ।

आओ बेटा थोड़ा ध्यान लगाएं और अन्तर्मन के मन्दिर की ज्योत प्रकाशित कर जन-जन के जीवन में ज्ञान के प्रकाश के मन्दिर को प्रकाशित करें।

बेटा आगे बड़ता है,और वक़्त रहते वक़्त के साथ जीने में ही भलाई है।
लेकिन वक़्त ,वक़्त बदलता है,तो  ना जाने अपने साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है ।


आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...