संदेश

* फितरत*

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**इंसान की फितरत ही ऐसी है
चाहता भी उसे ही है जो उसे
नसीब नहीं होता
चांद की दूरियां उसकी और अपनी
मजबूरियां सब जानता है फ़िर भी रब से
दुआओं में उसको को ही मांगता है
दिल में आस का दीपक जलाए
जिन्दगी भर जलता सिर्फ जलता और
सुलगता ही रहता है **

 *अक्सर देर हो जाती है
कुछ मिनटों का रास्ता
घंटों में तय होता है
नहीं चाहता कहीं रुकना
फिर भी ना जाने क्यों घंटों रुक जाता हूं
उलझ जाता हूं भटक जाता हूं
शुक्र है देर से ही सही लौट कर
घर पहुंच ही जाता हूं **

प्रेम की महक

प्रेम की महक
भी होती है
प्रेमियों के चेहरों पर
मुस्कराहट के रूप
में खिलती है
लब ख़ामोश
ख़ामोश निगाहें
बोलती हैं
ख़ामोश अदाएं
बहुत की वफ़ायें
कभी तो बोलो
कुछ तो राज खोलो
लबों को थोड़ा हिलाओ
लबों की पंखुड़ियों से
कुछ तो पुष्प ए गुलाब
बिखराओ ,जो दिल में
है उसे कभी तो जुबान पर लाओ
यूं नहीं ख़ामोश रहा करते
दिल के राज नहीं छुपाया करते
ये जो गंभीरता की छवि
बनाए बैठे हो दर्दे दिल को
दबाए बैठे हो  इसपर से
पर्दा हटाओ थोड़ा मुस्कराओ
दिल में जो पर परवाह के रूप में
प्रेम छिपाए   बैठे हो
उसमें थोड़ी मिश्री मिलाओ
प्रेम के इत्र से माहौल को
मेहकाओ .....






*अनोखा प्यार *

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*आव्यशक नहीं जो सामने है वो सत्य ही है किसी भी फल की पहचान ऊपरी परत हटाने पर ही पता चलती है *      यार तू रहने दे ,मैं इस दुनियां में अकेला था ,और अकेला ही ठीक हूं मेरा इस दुनियां में कोई नहीं।
   मेरी मां तो पहले ही इस दुनियां से चली गई थी और मेरा पिता वो तो जीते जी ही मेरे लिये बहुत पहले ही  मर गया था ।
जब मैं आठ साल का था मेरे बाप को शौंक चड़ा था मुझे तैराकी सिखाने का ......
क्या कोई पिता अपने बच्चे को ऐसी तैराकी सिखाता है , धकेल दे दिया था मुझे स्विमिंग पुल में और छोड़ दिया था अकेला मरने के लिए,मैं चिल्ला रहा था पापा मुझे निकालो मैं मर जाऊंगा मुझे तैरना नहीं आता है पर मेरा पापा टस से मस नहीं हुआ ,आखिर दस मिनट बाद बहुत मशक्त करने के बाद मैंने हाथ -पैर मार के तैरना ही सीख लिया।
  वैभव बोला हां और आज तू तैराकी चैंपियन भी है और कई अवार्ड भी ले चुका है,जानता है इसके पीछे कौन है ,तेरे पिताजी अगर उस दिन तेरे पिताजी तुझे अकेला ना छोड़ते तो तू आज तैरना ना सीख पाता और इतना बड़ा चैंपियन ना बनता ।
 अरे विशिष्ट अपनी आंखो से देख, अपने चाचा की बनाई बातों की झुठी पट्टी हटा ,गांधारी मत बन आंख…

कुछ तो है ( कश्मकश)

या तो मैं किसी को समझ नहीं पाता
या कोई मुझे समझ नहीं पाता
कुछ तो खामियां होंगी
हममें भी यूं ही कोई किसी
को ंनजरअंदाज नहीं करता
या तो वो मेरी पहुंच से बहुत ऊपर हैं
या फिर मैं उनकी समझ से बाहर
ये समझने ना समझने के खेल में
बड़ी कश्मकश है ,किस के मन में
क्या चल रहा है समझ नहीं आता
किसी को समझो कुछ
और असली चेहरा कुछ और ंनजर आता है
आईने के सामने तो हर कोई
स्वयं को स्वांरता है
जो आईने में ंनजर नहीं आता
किसी भी मनुष्य का चरित्र
उस पर क्यों नहीं ंनजर डालता
जाने क्यों मनुष्य स्वयम के चरित्र
को नहीं निखारता
कहते हैं मन के भाव चेहरे पर
झलक जाते हैं , फिर भी मनुष्य
आत्मिक सौंदर्य पर क्यो नहीं ंनजर डालता
या तो मैं किसी को समझ नहीं पाता
या मुझे कोई समझ नहीं पाता
इसी समझने ना समझने की कश्मकश
में जीवन गुजर जाता है ।


यूं ही कोई महात्मा नहीं हो जाता ********

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*अहिंसा परमोधर्म* *जय जवान जय किसान* मोहन दास करमचंद गांधी  कुछ तो विशेषता अवश्य रही होगी इस शक्सियत में यूं ही कोई महात्मा नहीं कहलाता ।
दे दी हमें आजादी बिना खड़क बिना ढाल साबरमती के संत तुमने कर दिया कमाल ।
हिंसा से हिंसा को मिटाने का प्रयत्न सभी करते हैं ,
और वह काल जब देश में अंग्रेजों का आधिपत्य था ,उस समय की स्थितियों को देखते हुए ,भारतीयों पर हो रहे जुल्म ,उस पर अपने देश के प्रति भारत वासियों का स्वभिमान आत्मसम्मान,  शीश कटा देंगे परंतु शीश झुकाना कदापि मंजूर नहीं था।
गांधीजी की दार्शनिक दृष्टि ने जिसको समझा आखिर कितने और कितने फांसी की सूली पर चड़ते,नहीं मंजूर हुआ होगा .....गांधी ने जाना हम भारत वासियों की सबसे बड़ी पूंजी है आत्मविश्वास, सत्य , अहिंसा की ताकत जिसके बल पर दुश्मनों को भी झुकाया का सकता है पहचाना और उसमें जोश भरना शुरू किया ।
अहिंसा परमोधर्म
 कहते हैं गांधी जी कहते थे कोई  आपके गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो
आज के युग में जब उग्रता सिर चढ़ कर बोल रही है एक हास्य का विषय है , परंतु इसके पीछे का दार्शनिक सत्य समझ पाना एक महात्मा की सोच हो सकती है…

शुभम करोती कल्याणम

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**यहां मेरी भावनाओं की कोई कदर नहीं .....

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प्रेरणास्पद, भावात्मक, काल्पनिक,हास्यास्पद, ( नाटक) श्रीमान जी :- सुनो श्रीमती जी बाहर से  किसी रद्धि वाले की आवाज आए तो उसे रोक लेना। और मुझे बुला लेना  मुझे कुछ बेचना है ।
श्रीमती जी:- अब क्या बेचना है ,अभी परसों ही तो सारा रद्दी  सामान दिया था ,जबकि मैंने कहा था एक दो अखबार बचा लेना अलमारी में बिछाने के लिए चाहिए थे ,तुमने तो एक भी अखबार नहीं छोड़ा था, अब क्या रह गया है कुछ, जो बेचना है ।
श्रीमान जी:- अरे भाग्यवान बस कुछ बेचना है ,बहुत कीमती है, परंतु कोई उनका मोल नहीं जानता ।
श्रीमती जी :- कीमती है और बेचना है,ऐसा क्या है कहीं मेरे गहने तो नहीं ....
श्रीमान जी:- तुम्हारे गहने वो तुम्हारे हैं अभी इतने भी बुरे दिन नहीं आए ,की मुझे ऐसा  कुछ बेचना पड़़े । श्रीमती जी:- अनमोल अजी मुझे तो घबराहट हो रही है आप ऐसा  क्या है जो रद्दी वाले को बेचने वाले हैं ,कहीं आप मुझे तो रद्दी वाले लो तो नहीं दे देंगे ......
श्रीमान जी:- राम -राम..... रद्दी वाला तुम्हें लेकर क्या करेगा , तुम्हें तो मैं ही झेल लूं इतना ही बहुत है.... व्यंग करते हुए श्री मान जी .....
श्रीमती जी:- हां -हां मेरी कीमत तो मेरे …