*बदलो तो यूं बदलो की आपको देखकर जमाना स्वयं को बदलने लगे*

*नकल करना बहुत आसान है पर कहते हैं ना नकल के लिए भी अकल चाहिए होती है किसी की अच्छी नकल करना जहां अच्छी बात है नहीं किसी की बुरी नकल करके हम स्वयं का ही बुरा कर बैठते हैं।
  बात हैआज की युवा पीढ़ी की, पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ती आज की युवा पीढ़ी

स्वयं के लिए पतन के रास्ते खोल रही है या यूं कहिए स्वयं के लिए गड्ढा खोद रही है ।


   अभी तक तो आज की युवा पीढ़ी पोशाकों और और भाषा की नकल कर रही थी ,और स्वयं को आधुनिकता की दौड़ में शामिल कर रही थी ।
  लेकिन अब स्थिति बहुत ही भयावह हो रही है की दिल रो पड़ता है भारतीय संस्कृति संसार की संगत संस्कृतियों से उच्च एवं श्रेष्ठ है भारत जैसे देश का युवा वर्ग जब पाश्चात्य संस्कृति की नकल में मद्यपान एवम् धूम्रपान के धुएं की गिरफ्त में आ चुके हैं और आ रहे हैं ,ये किस तरह की आधुनिकता है धूम्रपान का जहरीला धुआं हमारी सांसों को कम कर हमें रोगी बना रहा , ए धूम्रपान और हुक्के के धुएं की गिरफ्त में फंसे रहे युवाओं तुम्हारा भविष्य कैसा होगा कभी सोचा है ,तुम आने वाली अपनी पीढ़ियों को क्या दे रहे हो ,सोचो तो ज़रा ......
  ऐ मेरे युवा साथियों क्यों किसी की नकल करते हो    क्यों ना हम जैसे हैं वैसे रहे, स्वयं की वास्तविकता को पहचानो स्वयं को नीखारो

*बदलो तो यूं बदलो कि आप को देख कर जमाना स्वयं को बदलने लगे *

टिप्पणियाँ

  1. विचारणीय आलेख ! अगर बदलना भी हो तो किसी अच्छे सफल व्यक्ति का नकल किया जा सकता है।

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  2. बहुत सुन्दर सार्थक लेख...

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  3. बदलो तो यूं बदलो कि आप को देख कर जमाना स्वयं को बदलने लगे... सही कहा आपने ऋतु जी पर फैशन की मारी युवा पीढ़ी यह सब कहाँ सोचती है। बेहतरीन प्रस्तुति

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