जीवन और प्रलय

हाँ-हाँ -हाँ मैं नारी ही हूँ
सौंदर्य की प्रतिमूर्ति हूँ ।
मैं नारी ही ,माँ, बहन,बेटी भी हूँ ।
सिंह पर सवार हूँ ,
सिंह की दहाड़ हूँ
विशलकाय पहाड़ हूँ ।
अबला नहीं मैं सबला हूँ
गुलाब हूँ, काँटों के बीच सुरक्षित हूँ
चाँद हूँ, आफ़ताब हूँ,
सूर्य की आग भी हूँ ।
राजे ,महाराजे वीर,बलशाली
योद्धाओं की मैं ही जननी हूँ।
मैं नारी,नहीं बेचारी
मुझमें है शक्तित्व,
 मुझसे ही मिलता है समस्त
जगत को अस्तित्व
पाकर मुझसे व्यक्तित्व
 पौरुष के मद में ,मुझ
पर ही व्यंग कसे है
 नारी के बलिदानों
से इतिहास भरे हैं।
प्रेरणादायक कथा,कहानियों
के बीज डाल-डाल कर महापुरुषों
के शौर्य रचे हैं "मैने "
मैं नारी हूँ, सहनशीलता की प्रतिमूर्ति हूँ
मैं नारी माँ गँगा  की तरह
निरन्तर बहता हुआ निर्मल जल हूँ
मैं अगर जीवन हूँ,तो मैं ही प्रलयकाल भी हूँ
मैं नारी हूँ ,जन्म हूँ ,तो मृत्यु भी हूँ।





टिप्पणियाँ

  1. वाह्ह्ह....बहुत खूब मैं नारी हूँ👌👌
    बहुत सुंदर लिखा आपने रितु जी।

    जवाब देंहटाएं
  2. नारी इश्वर की रची वो रचना है जो है जो सर्वगुण संपन्न शक्ति पुंज है ...
    रचना के माध्यम से नारी स्वरुप को रखने का सार्थक प्रयास ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीय दिगाम्बर जी रचना पड़ने और प्रोत्साहित करने हेतु धन्यवाद सहित आभार

      हटाएं

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