**खूँटी पर बँधी है रस्सी**

खूँटी पर बँधी है रस्सी
एक डोर भवसागर की ओर
दूजी डोर धर्मराज की हाथ ।

धरती पर आया है ,
मुसाफ़िर बन कर
तू यूँ डाले है, धरती
पर डेरा ,जैसे की वापिसी
का टिकट ही न हो तेरा
हर एक का है,वापिसी का टिकट
 जीवन की डोर पहुँच रही है,ना जाने
किस-किस की धर्मराज के ,ओर
मौत की खूँटी पर लटकी है,गर्दन
पैर लटक रहे हैं कब्र पर
उस पर असीमित जिज्ञासाओं का मेला
दुनियाँ का मेला, मेले में हर शख्स अकेला
फिर काहे का तू पाले है,जिज्ञासाओं का झमेला,
क्यों करता है, तेरा-मेरा
दुनियाँ है,एक हसीन मेला
इस मेले से नहीं कुछ ले जा पायेगा
आ हम सब मिलकर अपनत्व के बीज डालें
परस्पर प्रेम की पौध उगा लें
भाईचारे संग प्रेम का वृक्ष जब पनप जायेगा
हमारे इस दुनिया से चले जाने के बाद भी
हमारा नाम रह जायेगा ।
मेले का आकर्षण बढ़ जायेगा
हर कोई परस्पर प्रेम का पाठ पड़ जायेगा ।।💐💐💐💐💐




टिप्पणियाँ

  1. हर एक का है,वापिसी का टिकट
    जीवन की डोर पहुँच रही है,ना जाने
    किस-किस की धर्मराज की ओर
    यहीं कड़वी सच्चाई हैं। सुंदर प्रस्तुति, रितु!

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार १६ अक्टूबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद ध्रुव सिंह जी मेरी लिखी रचना को halachal with5 links me शामिल करने के लिये ।

      हटाएं
  3. आदरणीया ऋतु जी सत्य कहा आपने कोई यहाँ अमर नहीं सबका अंत निश्चित है आज नहीं तो कल ! हम सब कठपुतलियाँ हैं प्रकृति के डोर से बंधे। तो काहे का उत्पात बहुत सुन्दर रचना सत्य का दर्पण दिखाती। बधाई
    "एकलव्य"

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर रचना ऋतु जी,सारगर्भित बात कही आपने,जाना तो तय है शाश्वत सत्य है फिर भी माया मोह का बंधन, यही तो जीवन है।

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर संदेश देती, आध्यात्म से जोड़ती हुई रचना । बधाई ।

    जवाब देंहटाएं
  6. आदरनीय ऋतू जी ---- जीवन के अक्षुण सत्य से साक्षात्कार कराती आपकी रचना आध्यात्मिकता का सन्देश दे रही है | काश ! हर कोई ये सत्य पहचान ले किजीवन एक एक साँस के घट रहा है और अमर होना मिथ्या लालसा है तो प्रेम का बीज पनपने की आशा बढ़ जाये गी सुंदर जीवन सन्देश से भरी रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई और शुभकामना |

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  7. सच कहा है ... बस यही रह जाना है ... रिश्तों का नाम, प्यार की गरिमा ... अपना नाम ... कुछ बचा सके इंसान तो इतना ही काफी है ... नहीं तो इस मुसाफिर खाने में कई आते जाते हैं ...

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