💐👌👍 🎂 🎂बचपन का मीठा सा नया साल 🎂🎂💐💐👍👌

            💐👌👍 🎂 🎂बचपन का मीठा सा नया साल 🎂🎂💐💐👍👌

 सच है ,बचपन के बारे में जितना कहा जाये वास्तव में कम है ।     यूँ तो मैं बचपन को बहुत पीछे छोड़ आयी हूँ  ,परन्तु अपने अन्दर  के  बचपने को कभी मरने नहीं दिया मैंने  ।क्योंकि बचपन से मासूम ,सादगी से भर जीवन दोबारा नहीं मिलता ।

इसी लिये कहते हैं न ,जिन्दगी को जिन्दा दिली से गुजारो क्यों रो -रो कर गुज़ारें ज़िन्दगी 😃 जितनी साँसों की माला मिली है जीना तो है ही फिर क्यों  ना हर लम्हे को हँस के जिंदादिली से जिये ।

नये साल का मौका है । आज मुझे नये साल से जुड़े कुछ लम्हें याद आ रहे हैं । नये साल का मौका नयी उमंग नयी तरंग  कुछ नया करने का मौका  हम क्यों पीछे रहते  पार्टी करना तो स्वभाविक ही था । अब तो नये साल हो या कोई भी भी अच्छा मौका हम सब लोग परिवार वाले ,दोस्त आदि पार्टी अरेंज करते हैं या फिर किसी होटल में जा कर पार्टी करते हैं । लेकिन आज से दस पंद्रह साल पहले ऐसा नहीं होता था ,जो भी मौज मस्ती करते थे घर पर  ,या फिर किसी मनोरंजन स्थल पर खाना बना कर ले जाते थे  और प्राकृतिक वातावरण में खेलते खाते ,मौज-मस्ती करते थे । 🌲🌳🌴🌹

कई वर्षों तक हम भी ऐसे ही नये साल के मौके पर खुशियाँ मनाते रहे । याद है मुझे वो दिन हम पाँच पड़ोसियों ने नया साल कुछ इस तरह मनाया पाँचों पड़ोसियों ने फैसला किया की हर एक अपने -अपने घर से कुछ न कुछ बना कर लायेगा ।खुश थे कि अलग -अलग व्यंजन खाने को मिलेंगे जब घर आकर हमने अपना प्रोग्राम घर वालों को बताया  ,पहले तो मेरी माता जी खुश हुई बोली तुम क्या बना कर ले जाओगे मैंने बोला कुछ भी पंजाबी खाना सब कह रहे थे ,कि मेरे घर से राजमा चावल आयेंगे ,और माँ आप सब भी चलोगे और सबके घर से सब लोग आयेंगे घर पर कोई नहीं रहेगा नया साल है , पहले हम मसूरी से थोड़ी दूर पहाड़ी पर स्थित है ,फिर मसूरी की हसीन वादियों का आनन्द लेंगे और खाना खायेंगे । मेरी माँ बोली अच्छा सुरकण्डा देवी हाँ मैं कब से जाने की सोच रही हूँ नये साल का पहला दिन माँ के दर्शन होंगे चलो अच्छा है ,और ये बता और कौन -कौन जा रहा है ,मैंने उन्हें सबके नाम बता दिये।माँ बोली अरे वो सलमा की माँ तो मुसलमान हैं ,वो थोड़ी मन्दिर जायेंगी ,मैंने माँ को बताया सबसे पहले उन्ही के घर पर प्रोग्राम् बनाया था उन्हें कोई एतराज नहीं है ,माँ बोली अच्छा वो भी खाना बना कर लायेगी  मैं तो नहीं खाऊँगी उसके घर का खाना ,मैं सकपकाई बोली माँ जब सलमा आँटी की बेटी घर आती है वो तो यहाँ सब खाती है और मैं उनके घर पर खाती हूँ ,माँ बोली तुम जो भी करो मैं नहीं खाऊँगी वो मॉस मछली खाने वाले नहीं मैं तो अपने घर का खा लूँगी हाँ सविता और बबीता के घर का कोई बात नहीं ,मैं माँ की बात सुनकर थोड़ी परेशान हुई फिर सोचा माता रानी सब ठीक करेगी ।🍇🍔🍟🍝

नये साल का पहला दिन हम लोग माता के दर्शनोँ के लिये अपने -अपने घरों से निकल दिये ,हम सब एक मिनी बस बैठ गये बस चल दी सबने जय माता का जय करा लगाया । हम सब माता के दर्शन के लिये चढाई चढ़ रहे थे ,सलमा आँटी बड़े जोर से बोली जय माता की मैं तो थक गयी सब सलमा आँटी को कहने लगे आँटी थोड़ी ही दूर है, चलो फिर खाना भी खाना है॥

लगभग एक घंटे में हम मन्दिर तक पहुंचे सबने माता के दर्शन किये पूजा पाठ भी किया और अपनी-अपनी मन्नते भी माँगी ।
 दर्शन करके हम लोग आस-पास के प्राकृतिक नजारों का आन्नद लेने लगे तभी मेरी माँ मेरे पास आकर बोली ये सलमा तो बड़े अच्छे से पूजा कर रही थी ऐसा लग ही नहीं रहा था की ,ये अलग धर्म की है । इतने में पीछे से आवाज आयी चलो भई खाई बैठने की करो बड़े जोर से भूख लगी है ,सबने अपना-खाना निकाल कर बीच में रख दिया सब थके हुए थे भूख भी लग रही थी बस जिसको जो अच्छा लग रहा था खाने लगा इतने में मेरे बगल में बैठी मेरी माँ धीरे से मेरे कान में बोली मुझे मत देना सलमा के घर का खाना मैंने भी ठीक है कहकर माँ को चुप करा दिया ,सब ही लोग एक दुसरे के घर के खाने का मजा ले रहे थे ,कोई कह रहा था राजमा तो लजावाब बनी है।
 कोई अरे ये भिण्डी खाओ ये दम आलू ये मटर पनीर आज तो मजा ही आ गया इतने में खाना खाते -खाते मेरी माँ बोली वो भिन्डी देना बड़ी अच्छी लग रही है और ये मटर पनीर वाह जिसने भी बनाये हैं उसके हाथों में तो जादू है।मैं मन ही मन मुस्करा रही थी और डर भी रही थी की अगर माँ को पता चला की मटर पनीर और भिण्डी सलमा आँटी ने बनाये थी तो वो बस पता नहीं मुझे कितना बुरा भला कहेंगी ।
*👌👍
 उस वर्ष का पहला दिन हम सबने बड़ा अच्छा बिताया ,सब अपने -अपने घर पहुँच रहे थे ,एक दुसरे के खाने की तारीफ़ भी कर रहे थे। सलमा आन्टी का घर आ गया था सबने उन्हें नये साल की बधाई दी ,इतने में मेरी माँ सलमा आन्टी के पास जाकर बोलीं तुम खाना तो बहुत अच्छा बनाती हो ,आज तो मजा आ गया मटर पनीर और भिण्डी खा के फिर कब खिलाओगी अपने हाथ का बना खाना सलमा आन्टी जानती थी की मेरी माँ सलमा आँटी के यह का खाना खाना पसंद नहीं करती क्योंकि वो मॉस मछली खाते है। सलमा आण्टी थोडा सकपकाई फिर बोली जब चाहो ,मेरी माँ बोली बस शाकाहारी होना चाहिये तुम तो मेरी छोटी बहन हो बहन के हाथ का खाना भला क्यों नहीं खाऊँगी ,और सलमा तुम भी आना हमारे घर खाने पर । सलमा आँटी, बबीता, सविता सब अपने -अपने घर चल दिये सबने एक दूसरे को नये साल की बधाई देकर विदा किया ।
घर के अन्दर पहुँचते ही मेरी माँ बोली आज तूने मुझे सलमा के घर का खाना खिला दिया मैंने बोला माँ सबके खाने में पता ही नहीं चला की कौन सा सलमा आन्टी के घर का खाना है , मेरी माँ बोली बेटा मुझे बुद्धू समझती है क्या ये तूने ठीक ,मैंने माँ की बात बीच में काटते हुये बोला माँ आप भी ना पता नहीं कौन से जमाने में जी रही हो ,मेरी माँ बोली  तो तुम्हे भी पता नहींकि तुम कौन से ज़माने में रह रही हो ।
हैं तो हम सब ईंसान ही ना क्या हुआ कोई किस जाती का है। वैसे तेरी सलमा आन्टी खाना स्वादिष्ट बनाती है ।👌👌👍👍🎂🎂🎂🌲👍👍👍👍☺☺☺☺☺😊😊
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इसी लिये कहते हैं न ,जिन्दगी को जिन्दा दिली से गुजारो क्यों रो -रो कर गुज़ारें ज़िन्दगी 😃 जितनी साँसों की माला मिली है जीना तो है ही फिर क्यों  ना हर लम्हे को हँस के जिंदादिली से जिये ।

नये साल का मौका है । आज मुझे नये साल से जुड़े कुछ लम्हें याद आ रहे हैं । नये साल का मौका नयी उमंग नयी तरंग  कुछ नया करने का मौका  हम क्यों पीछे रहते  पार्टी करना तो स्वभाविक ही था । अब तो नये साल हो या कोई भी भी अच्छा मौका हम सब लोग परिवार वाले ,दोस्त आदि पार्टी अरेंज करते हैं या फिर किसी होटल में जा कर पार्टी करते हैं । लेकिन आज से दस पंद्रह साल पहले ऐसा नहीं होता था ,जो भी मौज मस्ती करते थे घर पर  ,या फिर किसी मनोरंजन स्थल पर खाना बना कर ले जाते थे  और प्राकृतिक वातावरण में खेलते खाते ,मौज-मस्ती करते थे । 🌲🌳🌴🌹

कई वर्षों तक हम भी ऐसे ही नये साल के मौके पर खुशियाँ मनाते रहे । याद है मुझे वो दिन हम पाँच पड़ोसियों ने नया साल कुछ इस तरह मनाया पाँचों पड़ोसियों ने फैसला किया की हर एक अपने -अपने घर से कुछ न कुछ बना कर लायेगा ।खुश थे कि अलग -अलग व्यंजन खाने को मिलेंगे जब घर आकर हमने अपना प्रोग्राम घर वालों को बताया  ,पहले तो मेरी माता जी खुश हुई बोली तुम क्या बना कर ले जाओगे मैंने बोला कुछ भी पंजाबी खाना सब कह रहे थे ,कि मेरे घर से राजमा चावल आयेंगे ,और माँ आप सब भी चलोगे और सबके घर से सब लोग आयेंगे घर पर कोई नहीं रहेगा नया साल है , पहले हम मसूरी से थोड़ी दूर पहाड़ी पर स्थित है ,फिर मसूरी की हसीन वादियों का आनन्द लेंगे और खाना खायेंगे । मेरी माँ बोली अच्छा सुरकण्डा देवी हाँ मैं कब से जाने की सोच रही हूँ नये साल का पहला दिन माँ के दर्शन होंगे चलो अच्छा है ,और ये बता और कौन -कौन जा रहा है ,मैंने उन्हें सबके नाम बता दिये।माँ बोली अरे वो सलमा की माँ तो मुसलमान हैं ,वो थोड़ी मन्दिर जायेंगी ,मैंने माँ को बताया सबसे पहले उन्ही के घर पर प्रोग्राम् बनाया था उन्हें कोई एतराज नहीं है ,माँ बोली अच्छा वो भी खाना बना कर लायेगी  मैं तो नहीं खाऊँगी उसके घर का खाना ,मैं सकपकाई बोली माँ जब सलमा आँटी की बेटी घर आती है वो तो यहाँ सब खाती है और मैं उनके घर पर खाती हूँ ,माँ बोली तुम जो भी करो मैं नहीं खाऊँगी वो मॉस मछली खाने वाले नहीं मैं तो अपने घर का खा लूँगी हाँ सविता और बबीता के घर का कोई बात नहीं ,मैं माँ की बात सुनकर थोड़ी परेशान हुई फिर सोचा माता रानी सब ठीक करेगी ।🍇🍔🍟🍝

नये साल का पहला दिन हम लोग माता के दर्शनोँ के लिये अपने -अपने घरों से निकल दिये ,हम सब एक मिनी बस बैठ गये बस चल दी सबने जय माता का जय करा लगाया । हम सब माता के दर्शन के लिये चढाई चढ़ रहे थे ,सलमा आँटी बड़े जोर से बोली जय माता की मैं तो थक गयी सब सलमा आँटी को कहने लगे आँटी थोड़ी ही दूर है, चलो फिर खाना भी खाना है॥

लगभग एक घंटे में हम मन्दिर तक पहुंचे सबने माता के दर्शन किये पूजा पाठ भी किया और अपनी-अपनी मन्नते भी माँगी ।
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घर के अन्दर पहुँचते ही मेरी माँ बोली आज तूने मुझे सलमा के घर का खाना खिला दिया मैंने बोला माँ सबके खाने में पता ही नहीं चला की कौन सा सलमा आन्टी के घर का खाना है , मेरी माँ बोली बेटा मुझे बुद्धू समझती है क्या ये तूने ठीक ,मैंने माँ की बात बीच में काटते हुये बोला माँ आप भी ना पता नहीं कौन से जमाने में जी रही हो ,मेरी माँ बोली  तो तुम्हे भी पता नहींकि तुम कौन से ज़माने में रह रही हो ।
हैं तो हम सब ईंसान ही ना क्या हुआ कोई किस जाती का है। वैसे तेरी सलमा आन्टी खाना स्वादिष्ट बनाती है ।👌👌👍👍🎂🎂🎂🌲👍👍👍👍☺☺☺☺☺😊😊

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काश की वो वक्त वहीं थम जाता । हम बड़े न होते बच्चे ही रह जाते । पर क्या करें की प्रकर्ति का नियम है ,बचपन , जवानी बुढ़ापा , दुनियां यूं ही चलती रहती है । जिसने जन्म लिया है ,उसकी मृत्यु भी शास्वत सत्य है उससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता ये एक कड़वा सच है । हम बात कर रहे थे ,बचपन की , बचपन क्यों अच्छा लगता है । बचपन में हमें किसी से कोई वैर नहीं होता । बचपन का भोलापन ,सादगी ,हर रंग में रंग जाने की अदा भी क्या खूब होती है । मन में कोई द्वेष नहीं दो पल को लड़े रोये, फिर मस्त । कोई तेरा मेरा नहीं निष्पाप निर्द्वेष निष्कलंक मीठा प्यारा भोला बचपन । ना जाने हम क्यों बड़े हो गये , मन में कितने द्वेष पल गये बच्चे थे तो सच्चे थे , माना की अक्ल से कच्चे थे ,फिर भी बहुत ही अच्छे थे , भोलेपन से जीते थे फरेब न किसी से करते थे तितलियों संग बातें करते थे , चाँद सितारोँ में ऊँची उड़ाने भरते थे प्रेम की मीठी भाषा से सबको मोहित करते थे । बच्चे थे तो अच्छे थे । 

*****उम्मीद की किरण*****

**औकात की बात मत करना **