*अस्तित्व मेरा समुंदर*

**पूर्ण से शून्य की यात्रा
शून्य से फिर पूर्णता की
यात्रा ,शून्य का शून्य हो जाना ही
पूर्णता की यात्रा है...

कोयले की खान से
हीरे चुन कर लाने हैं
ये जिन्दगी बारूदी
सुरंग है, संभलकर चलना ज़रा ....

बहुत भटका बूंद बनकर
अस्तित्व मेरा समुंदर था
मैं अनभिज्ञ था समुंदर ही
मुझमें था ....

भटकता फिरता हूं दुनियां
 के मेले में,स्वयं की खोज में और
स्वयं का ही अस्तित्व मिटा बैठता हूं....

आया था दुनियां के
मेले में मौज -मस्ती करने को
मेले के आकर्षण में कुछ इस
कदर खोया की घर वापिसी
 का रास्ता ही भूल गया....



टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में " मंगलवार 13 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सादर आभार मीना जी मेरे द्वारा सृजित रचना को सांध्य मुखरित मौन में सम्मलित्त करने के लिए

    जवाब देंहटाएं
  3. गहन विचारों से गूँथा गय अध्यात्मिक सृजन। साधारण जीवन का गूढ़ अर्थ।
    बहुत सुंंदर रचना रितु जी।

    जवाब देंहटाएं

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