संदेश

'' खुला दरवाजा ''           

आज मैं कई महीनों  बाद अपने दूर के रिश्ते की अम्मा जी  से मिलने गयी।  ना जाने क्यों दिल कह रहा था ,की
ऋतु कभी अपने बड़े -बुजर्गों से भी मिल आया कर। आज कितनी अकेली हैं वो अम्मा ,  कभी वही घर था ,
भरा पूरा , अपने चार बच्चे ,  देवर -देवरानी उनके  बच्चे ,  सारे दिन चहल -पहल  रहती थी ,  ये नहीं की  मन मुटाव नहीं होते  थे , फिर भी दिलों मे मैल नहीं था।  दिल लगा  रहता था  मस्त।
मुझे याद है , जब  उनके बडे बेटे की शादी  हुई थी , बहुत खुश थी  अम्मा  की बहू आएगी  ,चारों तरफ  खुशियाँ होगी ,पोते -पोतियों  को खिलाऊँगी  ,कुछ महीने तो सब ख़ुशी -ख़ुशी  चलता रहा , परन्तु अचानक एक दिन
बेटे की नौकरी का तबादला हो गया , वह तबादला ट लने वाला नहीं था ,बस क्या था बहू बे टा दूसरे शहर बस गए।
एक एक करके चारों बेटों की शादियाँ  हो गयी।   सब कुछ ठीक से चलता रहा ,परन्तु  आज वो सयुंक्त  परिवार में रहने वाली अम्मा  जिसके सवयं के चार बेटे -बहुएँ  पोते -पोतियाँ  हैं ,सब अपने अलग -अलग मकानों में अलग जिंदगियाँ बिता रहें हैं।  
बूढ़ी अम्मा के घर का दरवाजा यूँ ही बंद रहता …
' हर -हर गंगे ' मै हूँ ,भारत की पहचान , भारतवासियों का अभिमान ,मा गंगा कहकर करतें हैं  सब मेरा सम्मान , सबके पाप पुण्य मुझे ही अर्पण ,मै हूँ निर्मलता का दर्पण , हिमालय की गोद से निकली ,गंगोत्री है मेरा धाम , शिव की जटाओं से नियन्त्रित ,प्रचण्ड वेग ,पवित्रतम गंग धारा।  सूर्य के तेज से ओजस्वी ,चन्द्रमा की शीतलता लिए ,चांदी सी , चमकती ,पतित पावनी पापों को धोती ,गतिशीलता  ही मेरी पहचान   भक्तों की हूँ ,मई आन बान और शान , गंगा जल से पूर्ण होते हैं सब काम , भगीरथी सुरसरि गंगे मैया इत्यादि हैं मेरे कई नाम ,   भक्त गंगे मैया गंगे मैया ,कहकर करते हैं जीवन नैया पार  युगों युगों से करती आई, भक्तों के जीवन का उद्धार  अपने भक्तों के पाप पुण्य सब मुझे हैं स्वीकार।
''  मेहनती हाथ  '' मेहनत मेरी पहचान ,मैं  मजदूर मजे से दूर।  धनाभाव के कारण  थोड़ा मजबूर , मैले कुचैले वस्त्र मिट्टी से सने हाथ।  तन पर हज़ारों घात कंकाल सा  तन 
मै मज़दूर कभी थकता नही , क्या कहूँ थक के चूर -चूर  भी हो जाऊं पर कहता नहीं। 
क्योंकि में हूँ मजबूर  मज़दूर------ मेरे पसीने की बूँदों से सिंचित बड़ी -बड़ी आलीशान ईमारतें  देख -देख सवयं पर नाज़ करता हुँ।  और अपनी टूटी -फूटी झोपड़ियों मे खुश रहता हूँ। 
यूं तो रहते हैं सब हमसे दूर , पर बड़े -बड़े सेठ हम से काम करवाने को मज़बूर  मजदूरों के बिना रह जाते हैं बड़े -बड़े आलिशान इमारतों के सपने अधूरे ----- में मजदूर सबके बड़े काम का ,फिर भी त्रिस्कृत  नहीं मिलता अधिकार मुझे मेरे हक का , में मजदूर बड़े काम का । 

''   दर्पण ''
         शायद मेरा दर्पण मैला है ,यह समझ , मै उसको बार -बार साफ़ करता।  दाग दर्पण में नहीं , मुझमे है, मुझे यकीन नहीं था।  परन्तु एक मसीहा जो हमेशा मेरे साथ चलता है , मुझे अच्छे बुरे का विवेक कराता है ,मेरा मार्गदर्शक है , मुझे गुमराह होने से बचाता है।  पर मै मनुष्य अपनी नादानियों से भटक जाता हूँ , स्वयं को समझदार समझ ठोकरें पर ठोकरें खाता  हूँ।  दुनियाँ की रंगीनियों में स्वयं को इस क़दर रंग लेता हूँ , कि अभद्र हो जाता हूँ ,  फिर दर्पण देख पछताता हूँ।  रोता हूँ ,और फिर लौटकर मसीहा के पास जाता हूँ ' उस मसीहा परम पिता के आगे शीश झुकता हूँ , उस पर भी अपनी नादानियों के इल्जाम मसीहा पर लगता हूँ।  वह मसीहा हम सब को माफ़ करता है , वह मसीहा हम सब की आत्मा में बैठा परम पिता परमात्मा है।
देने के सिवा मुझे  कुछ आता नहीं !!!!!                                                               एक दिन मैंने पुष्प से पुछा                                                          आकाश की छत  मिटटी की गोद ,                                                        क्या कारण  है जो काटों के  बीच भी,                                                              बगीचो की शोभा बढ़ाते  हो ,                                                    दुनिया को रंग-बिरंगा खूब सूरत बनाते हो                                                                   मुस्कुराहटें  फैलाते हो।
                                                           उदास चेहरों पर हँसी  ले आते हो                                                            इत्र बनकर हवा में समा  जाते हो                                              अपने इस छोटे से जीवन में जीने का अर्थ बता जाते हो                                                                ख़ुशी का सबब बन जाते हो।
                                                          पुष्प ने …
"क्योंकि वह दूर की सोचते थे"
{ -   कहते है न देर आये दुरुस्त आये  -३ }       सीधा,सरल और सच्चा रास्ता थोडा लम्बा और कठिनाइयों भरा अवश्य हो सकता है,परन्तु इसके बाद जो सफलता मिलती है,वह चिर स्थाई होती है।यह विषय मेरा पसंदीदा विषय है।
       माना कि,आज के युग मैं सीधे -सरल लोगो को दुनियाँ मूर्ख समझती है,या यूं कहिए कि ऐसे लोग ज्यादा बुधिमान लोगो कि श्रेणी मैं नहीं आते।  परन्तु वास्तव मैं वे साधारण लोगो कि तुलना में अधिक बुद्धिमान  होते है क्योंकि वह दूर कि सोचते है।  भारतीय पौराणिक इतिहास मैं सच्ची घटनाओ  पर आधारित कई ऐसे महाकाव्य है,उन महाकाव्य में महान व्यक्तियो जीवन चरित्र किसी भी विकट परिस्थिति  मैं सत्य और धर्म कि  राह  को न छोड़ने वाले जीवन चरित्र अदभुद अतुलनीय अमिट छाप छोड़ते है।
  रामायण,महाभारत उन्ही महाकाव्यों में से एक हैं। यह सिर्फ महाकाव्य ही नहीं परन्तु आदर्श जीवन कि अनमोल सम्पदाएँ हैं।

       मर्यादा पुरोषत्तम ''श्री राम '' प्राण जाए पर वचन न जाए
क्या रावण जैसे महादैत्य को मारने वाले श्री राम कभी कमजोर हो सकते हैं। राम जी…
किस्मत की  छड़ी 
सुन्दर सभ्य स्वर्ग तुल्य समाज की चाह रही है.   परीक्षाफल की समीप घडी है, वोटरों के हाथ नेताओं की किस्मत की छड़ी है , रजनीतिञ कुर्सियों की दिल की की धड़कन बड़ी है। अड़चन बड़ी है,कौन होगा मेरा  सही उम्मीदवार , बेसब्री से हो रहा इंतजार  कुर्सी की तो बस इतनी सी चाह है  जो हो मेरा उम्मीदवार वो हो ईमानदार,वफादार  
अपनी तो सभी करते है नैय्यापार, पर नेता वही जो स्वार्थ  से ऊपर उठकर करे देश का करे  उद्धार।   भाईचारा,परस्पर प्रेम हो जिसका व्यवहार , सुन्दर सभ्य स्वर्ग तुल्य समाज का हमारा सपना हो साकार।