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* भारत की पहचान *

*भारत मेरा  देश महान ,भारत माता की जय*
भारत मात्र क्षेत्रफल या क्या किसी सीमा का नाम  ही है ?   "भारत माता की जय " हम भारतीय अपने देश को माता का स्थान देते हैं ,क्योंकि माता का स्वरूप वसुंधरा की भांति सदैव अपनी संतानों के कर्म फलों का भार सहन करते हुए स्वयं को और अपनी संतानों को संभाले रहती है ,और कभी विचलित नहीं होती ।
  *भारत की पहचान भारत का अस्तित्व ,हम सब भारत के नागरिकों से हैं ,हम सब भारतीय भारत के नागरिकों से रहित, भारत देश मात्र क्षेत्रफल या सीमा ही बनकर रह जाएगा।
भारत की पहचान हैं , हम सवा सौ करोड़ देशवासी। आप , मैं और हम सब के बिना भारत की पहचान है ।सिर्फ एक क्षेत्रफल है ।
किसी भी देश की संस्कृति ,वहां की सभ्यता ही वहां के नागरिक और नागरिकों के उच्च आदर्श ,कर्मों में कर्मठता ,ज्ञान ,विज्ञान और संस्कार ही उस देश की पहचान और सभ्यता का प्रतीक होते हैं।
  सभी भारतीय ,भारत के नागरिकों के द्वारा किए गए निस्वार्थ कर्म जो स्वार्थ सिद्धि से ऊपर उठ कर सबके और समाज के हित में किए जाते हैं ,वह सब देश की धरोहर देश की वास्तविक सम्पदा है ।

सकारात्मक सामूहिक संकल्प शक्ति

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दिव्य मशाल की ज्वाला से  वायुमंडल को प्रकाशित करना  है वैश्विक महामारी के संकट काल में सामूहिक सात्विक ऊर्जा शक्ति से सकारात्मकता का दिव्य तेज  जब समस्त विश्व को प्रकाशित करेगा । तब नकारात्मक ऊर्जा के संकट को भागना ही पड़ेगा आत्मशक्ति के तेज का प्रकाश जब सम्पूर्ण विश्व में फैलेगा , तब अवश्य ही विश्व के समस्त प्राणी  स्वस्थ,निरोगी एवं दिव्य होंगे ।

पुष्पों में पुष्प पलाश

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पुष्प तुम विधाता की
प्रकृति को बेहतरीन
अनमोल ,अतुलनीय अद्भुत  देन या यूं कहिए भेंट हो ।
पुष्प तुम्हारी प्रजातियां अनेक पुष्पों में पुष्प पलाश  पल्लवित पलाश दर्शाता प्रकृति का वसुंधरा  के प्रति अप्रितम प्रेम दुल्हन सा श्रृंगार सौंदर्य का अद्भुत तेज  पुष्प तुम प्रकृति के  अनमोल रत्न दिव्य आधार पुष्प तुम श्रद्धा पुष्प तुम श्रृंगार  पुष्प तुम प्रेम  पुष्प तुम मित्रता  पुष्प तुम समर्पण पुष्प तुम महक पुष्प तुम रौनकें बहार पुष्प तुम संवेदना पुष्प तुम श्रद्धांजलि मिट्टी की गोद आकाश की छत कांटों के बीच भी मुस्कराते हो जीने की वजह बन जाते हो पुष्प ने कहा ,मेरा स्वभाव ही ऐसा है  मुस्कराने के सिवा कुछ आता नहीं  देने के सिवा कुछ भाता नहीं








*पलाश के पुष्पों का सुन्दर संसार*

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पलाश के पुष्पों का सुन्दर संसार
मन प्रफुल्लित रोम-रोम में होने
लगा अद्भुत रक्त संचार
सत्य है प्रकृति तुम हो जीवन का आधार
तुमसे ही सुन्दर संसार
वसुंधरा भी करती है श्रृंगार
मन मोहित हर्ष आभार
प्रकृति की बहार
नाच उठा मन मयूर
अद्भुत प्रकृति भी खूब चित्रकार

नई नवेली दुल्हन सा श्रृंगार
पलाश के पुष्पों की रक्तिम
बूटियों से जड़ी चुनरिया की कतार
अग्नि शोलों सा प्रतीत होता
सानिध्य में शीतल अतुलनीय
आभास ,मानों प्रेम की मीठी मिठास
रक्त वर्ण पलाश के पुष्पों की आभा
अग्निपथ प्रतीत होता
टेसू के कानन में जब झांका
प्राप्त हुई शांत ,निर्मल सुन्दर
रक्तिम पलाश के पुष्पों
की चुनरिया ओढ़े
दुल्हन ,प्रकृति चित्रकार
वसुंधरा दुल्हन ,अम्बर दूल्हा
देख मेरा रूप चांद भी शर्माता.......
पलाश के पुष्पों ने मेरा मन मोह में बांधा।




*काजल भागों वाला*

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* काजल जो बिखर  जाए तो कालिख  बन जाता है * काजल तू काला है फिर भी भाग्य वाला है  तेरा रूप निराला है  यकीनन किस्मत वाला है सौंदर्य का तू प्रेमी है बनकर काला टीका नज़र से बचाता है सौंदर्य को निहार स्वयं भी आकर्षण का केंद्र बन जाता है , काजल तुम वास्तव में भागों वाले हो
तुम्हें ही नयनों में सजाया जाता है
सौंदर्य का प्रसाधन भी माना जाता है
ऐ काजल तुम नयनों की शोभा बढ़ाना
नज़र से भी बचाना परंतु कभी ना किसी के
जीवन में कालिख बनकर मत आना
आना तो सौंदर्य ही बढ़ाने के लिए आना
नज़र से बचाने के लिए आना ।
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वक़्त लौटता है*
धारावाहिक सीरियल रामायण 1987में जब पहले दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ था उस समय रामायण देखने के लिए भारत वर्ष के सभी अपने जरूरी काम छोड़कर ,यहां तक की सड़कों पर यातायात भी यदाकदा रामायण धारावाहिक देखने के लिए जहां टेलीविजन पर रामायण चल रहा हो रुक जाता था ...... आज समय ने कैसी करवट ली ,आज वैश्विक संक्रमण के कारण भारत के लोग अपने -अपने घरों में रुके हैं ...... और आज इस समय में रामानंद निर्देशित रामायण सीरियल फिर से दिखाया जा रहा है ,कौन कहता है प्रतिफल नहीं मिलता
(कल जिनके लिए हम रुके थे, आज हम रुके हैं तो वो हमारे लिए चल पड़े ) उदाहरणार्थ *रामायण ,महाभारत*

*आग और धुआँ *

*आग और धुआँ *


  *मैं ज्योति उजाले के साथ आयी
सब और उजाला छा गया
मैं ज्योति जलती रही चहुँ और
उजाला ही उजाला  ........
सबकी आँखे चुंध्याने लगीं
जब आग थी ,तो उजाला भी था
उजाले की जगमगाहट भी थी
जगमगाहट में आकर्षण भी था
आकर्षण की कशिश मे, अँधेरे जो
गुमनाम थे  झरोंकों से झाँकते
धीमे -धीमे दस्तक दे रहे थे।
  उजाले मे सब इस क़दर व्यस्त थे कि
ज्योति के उजाले का कारण किसी ने नहीं
जानना चाहा, तभी ज्योति की आह से निकला दर्द सरेआम हो गया
  आँखों से अश्रु बहने लगे
काले धुयें ने हवाओं में अपना घर कर  लिया जब तक उजाला था
सब खुश थे उजाले के दर्द
को किसी ने नहीं जाना
जब दर्द धुआँ ,बनकर निकला तो सब
उसे कोसने लगे।
बताओ ये भी कोई बात हुई
जब तक हम जलते रहे सब खुश रहे
आज हमारी राख से धुआँ उठने लगा तो
सब हमें ही कोसने लगे
दिये तले अँधेरा किसी ने नहीं देखा
आग तो सबने देखी पर आग का की तड़प
उसका दर्द धुआँ बनकर उड़ा तो उसे  सबने कोसा
उसके दर्द को किसी ने नहीं जाना ।

*इंसानियत **

* शर्मसार होती इंसानियत*
    नहीं- नहीं -नहीं , मैं नहीं करूंगा जो तुम मुझसे करवाना चाहते हो ,चाहे मैं और मेरे बच्चे भूख से मर जाएं पर हम ऐसा काम कभी नहीं करेंगे ।
 इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं और हम अपने धर्म से कभी पीछे नहीं हटेंगे।
   अब्बा जान जरा दिमाग़ लगा कर सोचो ,सरकार ने नागरिकता बिल पास कराया है ,और सरकार का कहना है की सभी को नागरिकता लेनी पड़ेगी ....
 अब्बा जान - तो क्या हुआ ले लेंगे नागरिकता हमारा तो जन्म यहीं का है हमारी हमारा निका ह भी यहीं और यहीं के परिवार से हमारा रिश्ता जुड़ा अब कोई हम कहीं और थोड़े जाने वाले हैं , ले लेंगे यहीं को नागरिकता और यहीं के होकर रहेंगे इसमें दिक्कत क्या है।

 अब्बा जान ,आप भी ना बहुत सीधे हैं ये हिन्दुस्तान है,यहां हिन्दुओं का राज रहेगा ।

अब्बा जान अपने पड़ोसी मित्र पर झल्लाते हुए तो लल्लन हमें कौन सा राज करना है ,हमसे अपना घर परिवार सम्भल जाए वो ही काफी है ।
लल्लन, अब्बा जान से तुम्हें कोई नहीं समझ सकता  जब धक्के मार कर बाहर निकाल  जाओगे ना तब
पता चलेगा ।
अब्बा जान मैं आज ही यहां की नागरिकता लेता हूं फिर कौन निकलेगा हमें बाहर जब हम यहीं…

*काफिला*

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परिचय, पिताजी:- नाम चमनलाल उम्र ६५ वर्ष बेटा:- अमन उम्र २५ वर्ष टेलीविजन,समाचार वाचिका शर्मा जी- पड़ोसी पवन:- अमन का मित्र भीड़,में शोर मचाते,नारे लगाते लोग भीड़ में एक व्यक्ति पुलिस की गाड़ी :- सायरन की आवाज
(पहला दृश्य)  भीड़ का दृश्य
कुछ लोग भीड़ के पीछे आंखे बंद करके चल देते हैं उनसे पूछा जाए की तुम कहां और क्यों जा रहे हो तो जवाब मिलता है,जिस और सब जाएंगे वहीं तो जाएंगे, हम कोई अपनी डफ़ली अपना राग थोड़े अलापेंगे ।
  लोग कहते हैं कि देश देश बदल रहा है ,कुछ लोगों का कहना है की बड़े -बड़े बदलावों के होने से थोड़ी परेशानी तो होगी ही ।

        दूसरा दृश्य
पिताजी :-  खादी के कपड़े और चमड़े के सस्ते से जूते पहनने वाले पिताजी को उनके बेटे अमन ने ब्रैंडेड कपड़े और महंगे जूते लाकर दिए फिर क्या हुआ देखिए । पिताजी:-    आजकल देखो कुछ भी बदल जाता है कल तक मैं खादी का कुर्ता पाजामा और सस्ते से कपड़े के जूते पहनता था । और अब...
हे भगवान कैसा जमाना आ गया है ....बदल रहा है मेरा देश बदल रहा है।
पिताजी जूतों को अपने सीने से लगाए हुए
पिताजी नाम चमनलाल  - :   मेरे तो अच्छे दिन आ गए पूछो वो कैसे देखो…

*घर वास *

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आग लगी है बाहर वैश्विक संक्रमण की महमारी की कुछ दिनों के लिए इस आग से दूर हो जाओ आग स्वत: ही बूझ जायेगी ।
रुक जाओ थोड़ा ठहर जाओ कुछ दिन घरों के अंदर कैद हो जाओ, बाहर वैश्विक संक्रमण महामारी का राक्षस बैठा है जिसको छूने से ही संक्रमण फैल जाता है
तोड़ दो कुछ दिनों के लिए समाजिक संपर्क घरों में रहकर... लड़ना है एक महायुद्ध अपने-अपने घरों में रहकर क्योंकि इस युद्ध के क्रम को तोड़ना है ।
बाहर बैठा संक्रमण का शत्रु अकेले रहकर समयावधि में स्वत:ही मर जाएगा करोना का कहर बन फैल रहा है जहर थोड़ा ठहर ।
इधर-उधर मत भटको हाथों को बार-बार धोओ स्वच्छता पर विशेष ध्यान दो थोड़ी दूरी बनाओ समाजिक व्यवस्थाओं से दे स्वयं को आराम ।
लगी है एक आग वैश्विक संक्रमण महामरी की

*चेहरे से उदासी का पहरा हटाओ*

मेरे नयनों का लगा
मुझ पर ही पहरा
आइने में जो देखा
स्वयं का चेहरा ।

मासूम से मुखड़े पर
उदासी का पहरा
भाता नहीं हमको
उदास चेहरा।

मुस्कराहट का थोड़ा सा
चेहरे पर मल दे गुलाल
करणों में कर्णफूल तो डाल

घुंघराली लटों को
संवार
कर थोड़ा श्रृंगार
मृग नयनी इन नयनों
 में काजल तू डाल।

पैरों में पायल की खनक
तू डाल, हिरनी सी मतवाली
तेरी है चाल ।

गौरी तुम वैसे ही लगती कमाल
उस पर श्रृंगार की आदत तू डाल

तुझसे ही दुनियां में रंग बेहिसाब
उस पर तुम बातें भी करती बेमिसाल

शब्दों के मंथन से विचारों का
अमृत निकाल इस दुनियां को
दे फिर मालामाल ।
अपने औचित्य का डंका बजा
दुनियां में अपने अस्तित्व का झण्डा फहरा।






Covid 19 करोना (याद आया गुजरा जमाना)

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*याद आता है वो
दादा-दादी,नाना-नानी
चाचा-चाची बुआ-फूफा
का वो गुजरा जमाना *

 *अस्वच्छ हाथ ना हमें लगाना
हाथ ,पांव मूंह ,धोकर ही घर के
अंदर आना  तद  उपरांत ही किसी चीच को
हाथ लगाना *

*समझ छुआ -छूत उनका हमनें खूब मजाक उड़ाया*
आज करोना जैसी महामारी के संकट में अपने
बड़ों का कहा याद आया *

पादुका अपनी बाहर ही उतार कर आना
नहीं किसी बाहरी संक्रमण को घर के अंदर लाना।

पंच स्नान और स्वच्छ वस्त्रों को
धारण करके ही
भजन और भोजन करना ।

 झूठे हाथ ना कहीं और लगाना
बार-बार हाथ धोकर ही आना ।

उद्देश्य एक था संक्रामक रोगों से हमें बचाना।

*सौ प्रतिशत मिलावट का सच*

सौ प्रतिशत सच का  ,
मिलावटी सच
पक्के वादों का,
मिलावटी सच

दुग्ध में जल या जल में दुग्ध
मिलावट का अदृश्य सच

कहने में,करने में होने में,
मोहब्बत में,प्यार में ,
इरादों में,वादों में
सब में लगाया जाता है
स्वार्थ का मक्खन।

रंगों का बाजार
आकर्षण का संसार
तस्वीर के रंग हजार
मुखौटे लगा चल रहा है व्यापार
मिलावट की दुनियां के चर्चे हजार
फिर भी मिलावट का ही होता करोबार ।

सौ प्रतिशत सच का ,मिलावटी सच
चेहरे पर हंसी का मिलावटी पहरा
मिलावट का सौंदर्य, नायक -नायिकाओं के
आकर्षण का केंद्र

मिलावट की दुनियां के चर्चे हजार
मिलावट का रचता बसता संसार

बस एक ही विनती है और है मेरी
कुछ मिलावट कर लो नफरत में कुछ मिलावट
कर लो प्रेम की, स्वार्थ में कुछ मिलावट कर लो
निस्वार्थ प्रेम की ,
क्यों ना कर दें अब हम सब मिलकर मिलावट का ही
का काम तमाम।










*अति उत्तम हाथ जोड़ नमस्कार करो
लेन-देन कर्म एवं भोजन पूर्व
हाथ धोकर स्वच्छ करो
*घातक संक्रमण करोना* को दूर करो ना *




**दूर रहेगा घातक करोना **

**भारतीय परम्परा का अद्भुत
परिचय हाथ जोड़ नमस्कार करें **


भोर लालिमा हरी घास पर टहले तन को भी सूरज की किरणों से  सहलाएं,सूरज की गर्मी से रोग - प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाएं ।

योगाभ्यास व्यायाम दिन चर्या बनाएं जीवन रक्षक प्राकृतिक संपदाओं को अपनाएं ।

दैनिक कार्यों के अंतराल
स्वच्छता के नियमों को अपनाकर
स्वच्छ हाथों करें जीवन यापन करें।

प्राकृतिक सम्पदाओं का भरपूर उपयोग करें  नीम ,गिलोय तुलसी ,एलोवीरा का  सेवन कर कई रोगों को दूर भगाएं ।

सार्वजनिक स्थलों पर गंदगी ना मचाएं
स्वच्छता के नियम अपनाकर स्वस्थ जीवन अपनाएं

 **करोना के संक्रमण से डरोना
स्वस्थ जीवन के गुण अपनाकर
दूर रहेगा घातक करोना **


**मेरा धर्म तो इंसानियत है **

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नहीं- नहीं -नहीं , मैं नहीं करूंगा जो तुम मुझसे करवाना चाहते हो ,चाहे मैं और मेरे बच्चे भूख से मर जाएं पर हम ऐसा काम कभी नहीं करेंगे ।
 इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं और हम अपने धर्म से कभी पीछे नहीं हटेंगे।
   अब्बा जान जरा दिमाग़ लगा कर सोचो ,सरकार ने नागरिकता बिल पास कराया है ,और सरकार का कहना है की सभी को नागरिकता लेनी पड़ेगी .....
 अब्बा जान - तो क्या हुआ ले लेंगे नागरिकता हमारा तो जन्म यहीं का है हमारी हमारा निका ह भी यहीं और यहीं के परिवार से हमारा रिश्ता जुड़ा अब कोई हम कहीं और थोड़े जाने वाले हैं , ले लेंगे यहीं को नागरिकता और यहीं के होकर रहेंगे इसमें दिक्कत क्या है।
 अब्बा जान ,आप भी ना बहुत सीधे हैं ये हिन्दुस्तान है,यहां हिन्दुओं का राज रहेगा ।
अब्बा जान अपने पड़ोसी मित्र पर झल्लाते हुए तो लल्लन हमें कौन सा राज करना है ,हमसे अपना घर परिवार सम्भल जाए वो ही काफी है ।
लल्लन, अब्बा जान से तुम्हें कोई नहीं समझ सकता  जब धक्के मार कर बाहर निकाल  जाओगे ना तब
पता चलेगा ।
अब्बा जान मैं आज ही यहां की नागरिकता लेता हूं फिर कौन निकलेगा हमें बाहर जब हम यहीं के हो जाएंगे ।

     दूसर…

*मैं प्रकृति अत्यंत दिलदार हूं मैं *

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*मैं प्रकृति अत्यंत दिलदार हूं मैं*
प्रकृति प्रदत अमिय
जीवन का सार हूं मैं
स्वच्छंद निर्मल जलधार हूं मैं
हां मैं प्रकृति, देवस्थान अनन्त
निस्वार्थ सेवा की रसधार हूं मैं।

मैं प्रकृति बहुत दिलदार हूं मैं
अन्न, कंद - मंद फल, फूल का भंडार हूं मैं।

ममत्व का सरस-सरल अद्भुत, संसार हूं मैं
पूज्य धरती माता, उठाती दुनियां का भार हूं मैं।

उस पर भी सहती अत्याचार हूं मैं
मैं वसुंधरा मुझ पर ही बनते सपनों के महल
और पाती खंजर से वार हूं मैं
मेरे द्वारा ही पोषित , मैं ही पालना
मैं प्रकृति प्राणियों का संसार हूं मैं
मैं प्रकृति प्राणियों से समृद्ध,
प्राणियों से ही संसार का अस्तित्व....


*मेरी भूमिका *

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**हम महिलाओं की भूमिका पर्दे के पीछे के सच्चे और अथक
पुरूषाथ का परिदृश्य होती है **
समाज की नींव ,संस्कारों की उर्वरा
विचारों की समृद्धि मेरे द्वारा ही रोपी जाती है
मैं एक नारी हूं ,जो अबोध को सुबोध बनाती हूं
एक स्वस्थ शिशु की पालना में अपना सर्वस्व लुटाती हूं
मैं एक नारी ही हूं जो  मकान  को घर बनाती हूं
सकारात्मक ऊर्जा से मनुष्यों के मन मस्तिष्क को शुभ भावनाओं से पोषित करती हूं ,संस्कारों के बीज अंकुरित कर समृद्ध समाज की नींव रखने की पहल करती हूं *
*हम नारी है *
हमारी भूमिकाएं अदृश्य हैं
परंतु नींव की बुनियाद हम ही होती है
समृद्ध समाज की कर्णधार भी हम ही होती हैं
समाज की तरक्की और उन्नति के सूचक
की प्रथम भूमिका हम महिलाओं की होती है
दुर्गा है , काली हैं,अन्नपूर्णा है सरस्वती हैं
फिर भी सहनशक्ति और प्रेम का सागर हैं
हम महिलाएं क्या करती हैं कह कर भी ,
समाज की नींव में मील का पत्थर बनकर खड़ी रहती हैं
कांधो पर समृद्ध समाज की नींव का भार लिए स हन शक्ति की अद्भुत मिसाल होती हैं।
 नींव से छेड़छाड़ समाज के पतन का कारण बनती है।
नींव हिलती है तो सारी सृष्टि हिल जाती है
हम महिलाओं की भूमिका प…

* मुख्य भूमिका *

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महिलाएं समाज की नींव हैं ,महिलाओं की भूमिका के बिना समाज का कोई औचित्य ही नहीं ,इसलिए नींव पर मत प्रहार करना ,प्रहार किया तो इसकी तह में समा जाओगे मिट जाओगे ढेः जाओगे ।
 * महिलाओं को महिला दिवस की बधाई हो
,महिलाओं को सम्मान देनें की बात हुई यह भी अपने आप में बहुत बड़ी बात है ।
 चलिए कुछ सोचा तो गया महिलाओं के बारे में की महिलाओं भी कुछ कर सकती हैं ।

बस आज थोड़ा सा व्यंग करने को मन कर रहा है ,..किन्तु व्यंग में भी सच ही है ।

अरे भई क्यों ?   महिलाओं के लिए सिर्फ एक दिन का सम्मान साल के 365 दिन में से एक दिन महलिआओं को सम्मान दिया जाएगा , और  बाकी के364 दिन किस को सम्मान दिया जाएगा ...... चलो छोडिए ।
महिलाओं को किसी विशेष दिवस की आवयश्कता नहीं ..... महिला दिवस हर दिन होता है हर रोज होता है और प्रतिपल होता है ,और सदा सर्वदा होता रहेगा ।
हां अगर सम्मान की बात है तो हम महिलाओं को एक दिन का ही सम्मान ...  अरे वाह ! ऐसा नहीं चलेगा
महिलाओं को सम्मान देना है तो जीवन पर्यन्त दो।
 महिलाओं को किसी विशेष दिवस को देनेकी आवयश्कता कैसे और क्यों पड़ी?
  ओहो अच्छा तो बात यह है कि पुरुष प्रधान समाज को…

*जीवन की पतवार*

भागती-दौड़ती जिन्दगी की रफ्तार
ढील देता पतवार
क्षीण तार लहूलुहान
सम्भल जा मानव.....
तन के पिंजरे में
कैद सांसों के
जोड़ की तार
हृदय प्राणवायु
की पतवार ......
अस्तित्व था मेरा
समुन्दर
लहरों संग बाहर
आ निकला बूंद बनकर
जा बैठा कोमल
कपोलों के गुलाबों पर
इतराया खूब शबाब पर
देखकर सुन्दर ख्वाब मैं
जैसे सीप में मोती
नयनों में ज्योति
पुष्पों में ओस .....
अनामिका से उठाकर
फेंका मुझे इस कदर
मैं बूंद से फिर हो गई समुंदर
बूंद -बूंद एकत्र होकर माना की
मैं बनी समुंदर .....
बूंद की पतवार है समुंदर
समुंदर का जीवन है बूंदों के अंदर
तन के पिंजरे में कैद
सांसों की तार
हृदय प्राणवायु की पतवार ......














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विचार,एहसास और भाव

मैं लिखती हूं की मेरे पास भाव हैं  एहसास हैं। विचार हैं ,  स्वयं में पनपते  विचारों को सही दिशा रूप -रेखा एवं आकार देकर या यूं कहिए अपने विचारों को सजा संवार कर एक दुल्हन की तरह सीमा पर तैनात रक्षप्रहरी की भांति विद्यालय में शिक्षक की तरह ,घर में माता और गुरुजन की तरह तैयार करके समाज के समक्ष  प्रस्तुत करती हूं। मेरे विचार मेरी निजी संपत्ति है । मेरा मेरे विचारों पर पूर्ण अधिकार है । अगर मेरे विचार किसी के कहने देखने और बहकाने  से भड़कते हैं तो इसका तात्पर्य  मैं कमजोर हूं  गुलाम हूं ,मुझे अपने विचारों पर अपना नियंत्रण करना ही नहीं आया । अतः मेरा तो यही मानना है पहले स्वयं के विचारों पर नियंत्रण करना सीखिए । किसी अन्य को दोष देने से कुछ नहीं होगा । अपने विचारों को इतना श्रेष्ठ बनाइए की बदल जाए   दुनियां आपके विचारों से प्रेरित होकर ।

*लेखनी भाव सूचक*

"लेखनी"अक्सर यही कहा जाता है ,की लेखनी लिखती है
जी हां अवश्य लेखनी का काम लिखना ही है ।
या यूं कहिए लेखनी एक साधन एवम् हथियार की भांति अपना काम करती है। लेखनी सिर्फ लिखती ही नहीं ,लेखनी बोलती है ,लेखनी कहती है ,लेखनी अंतर्मन में छुपे भावों को शब्दों के रूप में पिरोकर कविता,कहानी,लेख के रूप में परोस्ती है।
समाजिक परिस्थितियों से प्रभावित दिल के उद्गारों के प्रति सम भावना लिए लेखक की लेखनी -- वीर रस लिखकर यलगार करती है,लेखनी प्रेरित करती है देश प्रति सम्मान की भावना जो प्रति जन-जन में छिपी  देश प्रेम की भावनाओं को जागृत कर देश के शहीदों के प्रति सम्मान और गर्व का एहसास कराती है ।
वात्सल्य रस, प्रेम रस,हास्य रस,वीर रस ,लेखनी में कई रसों के रसास्वादन का रस या भाव होते हैं ।
महापुरुषों के जीवन परिचय को उनके साहसिक एवम् प्रेरणास्पद कार्यों को एक लेखक की लेखनी स हज कर रखती है ,और समय -समय महापुरुषों के जीवन चरित्र पड़कर जन समाज का मार्गदर्शन करती है ।
लेखनी का रंग
जब एहसासो के रूप में
भावनाओं के माध्यम से
काग़ज़ पर संवरता है
और जन-मानस के हृदय को
झकझोर कर मन पर अपनी छाप छोड़ता है …

मधुर राग *****

लिखने जो बैठा मधुर राग  खुलने लगे कई राज लब गीत गुनगुनाने लगे चेहरे मुस्कराने लगे हृदय ने छेड दी  तान
बजने लगे साज
आज बस में नहीं मेरे जज़्बात

आज फिर हृदय तरंगों में सुनाई
दे रहे है कई  शुभ संकेतों की पदचाप

फिजाओं में बिखरी है मंद मंद सुगंध
मन मयूर नाचे दसों दिशाओं में
फैल रहा है प्रकाश का स्वर्ण
गुनगुना रहे हैं भंवरे स्वछंद

मीठी सी कसक
चेहरे पर बिखरी है चमक
प्रफुल्लित है दिल ए गुलाब
सुनाई दे रही है मीठी सी खनक
सोलह कला सम्पूर्ण है पूर्णिमा का आफताब.....






*पदचाप जिसने बढ़ाया रक्तचाप*

उस पल उस "पदचाप" की आवाज सुनकर जो मेरा रक्तचाप बड़ा था ,वो रक्तचाप आज भी बड़ने लगता है जब वो पल मुझे याद आता है ।
 आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं आखिर मुझे उस दिन इतना डर क्यों लगा , मैं इतनी डरपोक तो नहीं फिर भी ऐसा क्या हुआ उस दिन जो मैं भी डर गयी थी।
 यह बात सच है की कोई भी मनुष्य कितना भी ब हादुर क्यों ना हो परन्तु उसके दिमाग के कोने में एक डर अवश्य छिपा होता है ।
उस दिन लगभग रात्रि दो बजे की बात होगी, मुझे प्यास लगी थी ,यूं तो हर रोज रात्रि शयन से पहले मैं एक गिलास पानी अपने कमरे में रख लेती थी लेकिन उस ना जाने क्यों पानी रखना भूल गई ,प्यास बहुत तेज थी मूंह सूख रहा था मैं पानी लेने के लिए रसोई घर की और चल दी ।  हमारे घर में बालकनी से होकर सीढ़ियां ऊपर की और जाती हैं ,तभी मुझे सीढ़ियों में कुछ आवाज सुनाई दी पायल खनकने की ,मैंने न नजरअंदाज  किया ,और अपना पानी लेकर पीने लगी , मैं पानी लेकर अपने कमरे में जा रही थी ,तभी सीढ़ियों में से कुछ गिरने की आवाज अाई और मैं डर के मारे कांप गई ।
  अरे भाभी आप पानी लेने आयी थी , मैं भी अभी यहां से पानी लेकर गई जाते हुए जग का ढ़क्क…

** जीवन की ऊंचाईयां**

*ऊंचाइयों पर पहुंचेगा अवश्य आचरण की सभ्यता का संग जीवन में श्रेष्ठ विचारों का रंग सत्य और सरलता की मशाल विश्वास की डोर थाम ... कहीं समतल,कहीं खाई कहीं जंगल तो कहीं विशाल पर्वत चट्टानों सी अडिग बाधाओंं की जंजीरों की बेड़ियां पत्थरों की ठोकरों से लहूलुहान तुम हार मत जाना नकारात्मकता के अंधेरे में घिर मत जाना सकारात्मकता की ज्योत से अडिग निडर हर बाधा से लड़ जाना तेरे परिश्रम का फल तू एक दिन अवश्य पाएगा श्रेष्ठ विचारों की पूंजी से तेरा जीवन सर्वत्र पूजा जायेगा ।

*अभी ना होगा तेरा अंत ,अभी तो तू जन्मा है *

* अभी तक तो तू सोया था
मद के सपनों में खोया था
अभी ना होगा तेरा अंत
अभी तो हुआ है तेरा जन्म
करके वसुन्धरा को नमन
आत्मा से बोल वन्दे मातरम्

मानवता कराह रही है
फैल रहा है कूटनीति का जहर
आतंकियों रूपी रक्तबीजों का उत्पाद
करने को निशाचरों का नाश
हो सिंह पर सवार
बन चंडी दुर्गा और काली
उठा त्रिशूल और बचा मानवता की लाज....
परशुराम बन उठा फरसा और
उखाड़ फेंक जहरीले बीजों को काट..

अधर्म पर धर्म की जीत
असत्य पर सत्य की जीत
रामराज्य स्थापित करना है फिर से
घर -घर माखन मिश्री की रस धार बहे
पन्ना धाय सी हर माता हो
मदर टेरेसा सा निस्वार्थ सेवा धर्म हो
घर-घर प्रेम का मन्दिर हो
अभिवादन हो सबका अथिति सत्कार
*सोने की चिड़िया*बनने को फिर से उत्सुक है
भारत माता के सिर सुशोभित रहे विश्व गुरु का ताज ।




















**देश भक्ति की चिंगारी ***

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*भारत माता की जय *
*मेरा देश महान *
*भारत भूमि *की आन में
 और शान में 
 ये महज शब्द नहीं 
 मेरे मन के भाव हैं
 देश प्रेम के प्रति 
 दिल में सुलगतीआग है 
 देश प्रेम की आग जो 
 मुझे भीतर ही भीतर
  सुलगाती है
आत्मा रोती है जब मेरे देश की जनता धर्म
जाति और राजनीति के आड़ में हिंसा फैलाती है
मेरे हृदय की आग मुझमें धधकती है जब
किशोरियों की अस्मिताएं लूटी जाती हैं
मेरे हृदय की आग ज्वाला बनकर
मुझे मुझमें ही जलाती है जब सरहद पर तैनात
भारत का वीर सपूत भारत भूमि की आन में
शहीद हो जाता है
मेरे भीतर देश प्रेम की आग
मुझे मेरे देश की शान में
कुछ लिखने को कुछ कहने
को और भारत माता के सम्मान
में भारत माता की जय
बोलने को प्रेरित करती है ।
मेरे भीतर की आग मुझे भारत
की आन में और शान में
एक सभ्य सुशिक्षित मनुष्य
 बनने को प्रेरित करती है ।




आग नहीं तो क्या है...

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भूख की आग कभी
किसी को ना सताए
कभी किसी को ना रुलाए
आग लगी थी पेट में भूख की
जो पांच साल के बच्चे
को रोटी चोरी करने
को मजबूर कर गई

चक्षुओं से कपोलों
तक छपे अश्रुओं के
अमिट निशान
नासिका पर सूखता
द्रव्य पदार्थ
तन पर पड़ा आधा-अधूरा पट

वो उसके पेट की आग ही तो थी
जो उसे मजबूर कर रही थी
झूठे पत्तलों में से अन्न के दाने
बीन कर खाने को ....

वो उसके पेट की आग ही तो थी
जो उसे मजबूर कर रही थी
कचरे में निगाहों को घुमाने को
पेट की क्षुधा मिटाने को....
एक आग ही तो थी
रोटी के टुकड़े को चोरी करने को.....