*विस्मृत बोध *

*विस्मृत बोध
उलझते उद्वेग
विचार शून्य विवेक
हाय!मनुष्य क्या हो
गया तुझे, उलझ बैठा है
तू करके अपनों से द्वेष
तू तो फरिश्ता ए आसमान है
तुम तो दिव्य शक्तियों की खान हो *

*आरम्भ का सत्य अव्यक्त
आरम्भ ही शाश्वत सत्य
आरम्भ से अंत तक का सफ़र
सफ़र का दौर ,जीवन की दौड़
विहंगम,अतुलित, अकल्पनीय
तेज़ का प्रताप
अद्वितीय शक्तियों के पुंज
व्याप्त कुंज-कुंज
मनुष्य जीवन का आगाज़
परमाणु से उपजा अणु
या यूं कहिए अणुओं से बना परमाणु
मनुष्य एक सुन्दर कृति
उस पर विचारों की धृति
भावनाओं का अथाह सागर
मनुष्य स्वयं में सशक्त
भावों के चक्रव्यूह में फंसा
बन बैठा अशक्त
प्रतिस्पर्धा की दौड़
की लगी होड़
लगा बैठा रोग
बन बैठाअध्रंग**


आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...