भावों का सार


विचार अभिव्यक्ति को 

विचारों का मंथन तो 

अवश्य होता है किन्तु 

भावों की उलझन में 

भावों की खिचड़ी ही बन जाती है ।

ना भाव रहते हैं ना भावों का सार 

सारा रस ही समाप्त हो जाता है 

और वास्तविक विचार स्वाहा हो जाता है 

विचार अभिव्यक्ति की उलझन में ।

विपरीत परिस्थितियां 

विपरीत हालात 

फिर भी जीने का हो मस्त अंदाज

जिंदादिली से जीने कला 

हौसलों में हो उड़ान ,

मुश्किलों को हंसकर पार कर जाना जिसकी शान  

किस्मत के हाथों बदल ही जाते हैं उसके हालत । 






 


2 टिप्‍पणियां:

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