💐मेरा मज़हब मोहब्बत💐

*क्या करूँ ,मेरा तो मज़हब ही मोहब्बत है
मोहब्बत के सिवा मुझे कुछ समझ ही न आये *
तो मैं क्या करूं ?

"हम तो मोहब्बतें चिराग जलाये बैठे रहेगें
चिरागों से नफरतों के अँधेरे दूर होते रहेंगे
चिराग तो जलते ही हैं ,जहाँ को रोशन करने के लिये
अब कोई अपना मन जलाये तो हम क्या करें
किसी को समझ ना आये तो हम क्या करें"

मोहब्बत की आग तो चिराग़े दिलों में ही
जला करती है, यूँ तो *ये*मोहब्बत की आग दिलों को
ठंडक देती है , पर कभी-कभी दिलों को जला
भी देती है।

"आग है तो ,चिंगारियाँ भी होंगीं ,
चिंगारियाँ होंगीं तो ,आग भी होगी
आग होगी तो ,जलन भी होगी
पर एक खूबसूरत बात आग के साथ
रोशनी भी आपार  होगी"
*मोहब्बते चिराग यूँ ही तो नहीं जला करते
सूरज भी हर-पल जला ही है
उजालों की खातिर ,जलना ही पढ़ता है
हासिल कुछ हो या न हो,चिराग जलता ही है
अन्धकार दूर करने के लिये है**

*मोहब्बतों का कोई मज़हब नहीं होता
  मज़हब तो ,विचारों और विवादों का होता है
 सबसे बड़ा मज़हब तो मोहब्बत ही है
"जिसमें न कोई हिन्दू,ना मुसलमान ,न ईसाई होता है
होता है तो सिर्फ इन्सान होता है ,सिर्फ इंसान होता हैं"***

💐💐धरती को स्वर्ग से सुंदर तो बनाइये💐💐


आओ-आओ सखियों
हमारे प्रभु श्री राम ,लक्ष्मण,माता सीता,
हनुमान जी के साथ चौदह वर्ष बाद
वनवास से लौट रहे हैं ।
मन हर्षित ,प्रफुल्लित है ,जन-जन के प्रिय
श्री राम ,जानकी अयोध्या लौट रहे हैं ।
अमावस्या की काली घनी अंधेरी रात थी
घर, आँगन ,गली ,मोहल्ले दीपों के प्रकाश से प्रकाशित किये गये , प्रकाश की इतनी सुंदर व्यवस्था हुई
की लक्ष्मी भी हर्षित हुई घर-घर में लक्ष्मी जी की कृपा दृष्टि हुई, सुख-समृद्धि धन-धान्य से सब परिपूर्ण हुए,
प्रसन्नता वश  आतिशबाजी ,व फुलझड़ियां भी प्रज्ज्वलित की गयी
वो सतयुग था ,तब से अब तक दीपावली का त्यौहार कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हर्षोल्लास से मनाया जाता है ।
  पर ये क्या ?कलयुग में दीपावली यानि अपने ईष्ट के स्वागत की दीपों वाली रात को कितना जहरीला और दिखावटी रूप दे दिया है । ईर्ष्या वश सब एक दूसरे को देखकर जलभुन रहे हैं ,दिलों में प्रेम नहीं और मिठाइयां खिला रहे हैं ।
सर्वप्रथम घरों की और अपने-अपने व्यवसायिक स्थलों की साफ-सफाई करते  है ,फिर अनगिनत जहरीले पटाखे जलाकर अस्वच्छता फैलाते हैं वातावरण भी दूषित ....हाय- हाय ये कैसा स्वागत ,ये कैसी दीपावली ।
माना कि त्यौहार का मौका है,दिल में उमंग, उत्साह भी आवयशक है । परस्पर प्रेम से सब गिले-शिकवे मिटाइये ।
बाहर की स्वच्छता के साथ-साथ भीतरी स्वच्छ्ता भी आवयशक है ,मन में मैल भरा रहा तो भगवान कहाँ आयेंगे।
दीपावली का त्यौहार अवश्य मनाईये ।
लक्ष्मी जी का स्वागत करिये, पर अनादर नहीं ,बारूद के पटाखों से वातावरण को दूषित कर आज का समाज जहरीली वायु मे स्वयं तो साँस लेता है ,और चाहता है, की उसके ईष्ट भी इस जहरीले वातावरण में आयें ।
नहीं भई नहीं ,परमात्मा क्यों आयेगा इतने जहरीले युग में
💐वो तो स्वर्ग में रहता है, जहाँ सब और निर्मलता है 💐💐
परमात्मा का स्वागत करना है तो पहले तन ,और मन को स्वच्छ करिये वातावरण में रासायनिक जहर को घुलने से रोकिए ।
पहले धरती को स्वर्ग से सुंदर तो बनाइये फिर दौड़े -दौड़े चले आयेंगे भगवान ......💐💐💐

💐💐दिव्य प्रकाशमय दीपावली💐💐


त्यौहार:-
        त्यौहार यानि,हर्षोल्लास, उमंग,उत्साह,
दीपावली का त्यौहार,दिल में नया उत्साह,नयी उमंग
सबसे बड़ा काम घर की साफ़-सफाई ।
माँ पास आकर बोली,कल शनिवार है,परसों रविवार, कल और परसों तेरी,आफ़िस की छुट्टी है, ये नहीं की देर तक सोती रहे,कल जल्दी उठ जाना चार दिन बाद दीवाली है,अभी तक ढंग से साफ़-सफाई भी नहीं हुई ,कल सुबह काम वाली बाई के
साथ मिलकर अच्छे से सफाई करवा लेना ।
बेटी मीता बोली हाँ माँ ,मैं भी यही सोच रही थी, फिर सजावट भी तो करनी होगी ,
माँ पता है,बाज़ार में बहुत सूंदर-सूंदर सजावट का सामान आ रखा है।
इतने में दो पड़ोसी बच्चे आ गये ,कहने लगे बुआ जी आपने कहा था ,जब अगले साल हम आठ साल के हो जायेंगे ,तब आप हमें पटाखे दिलायेंगी ।
मीता बोली पटाखे ?
बच्चे बोले बुआ आपने बोला था अगले साल तुम और बड़े हो जाओगे तब तुम्हें बहुत सारे पटाखे दिलाऊंगी ।
मीता बुआ कहती है, पटाखे तो मैं तुम्हें दिल दूँगी ,लेकिन बताओ,पटाखे जला कर तुम्हें फायदा क्या मिलेगा?
बच्चे बोले बुआ जी, बता है ,बजार में कितने अच्छे-अच्छे पटाखे आ रखे हैं।
दीदी बोली मुझे सब पता है, पर ये बताओ पटाखे जलाकर तुम्हे फायदा क्या मिलेगा ?
बच्चे बोले ,बुआ पटाखे जलाकर बहुत अच्छा लगेगा ,मेरा एक दोस्त है,ना उसके पापा तो उसके लिये बहुत सारे पैसों के पटाखे ले भी आये हैं।
बुआ मीता बोली अच्छा ,फिर तो उन्होंने पटाखे लाकर अपने पैसे तो बर्बाद करे ही ,साथ मे वातावरण को दूषित करने का सामान भी ले लिया ।
तुम जानते हो बच्चों पटाखों में अनगिनत जहरीली रसायन होते हैं , और जब हम उन्हें जलाते हैं तो उनमें से जहरीले रसायनों का धुआँ हमारे आस-पास के वातावरण को दूषित करता है,और जब हम साँस लेते हैं तब हमारी साँसों के साथ हमारे शरीर में जाकर हमे भी बीमार करता है, इन पटाखों से बहुत ही जहरीले रसायन निकलते हैं बच्चों ।
बच्चे :-बुआ जी आप हमें पटाखे नहीं दिलाना चाहती तो साफ-साफ मना कर दो।
बुआ को लगा बच्चे अब तो नाराज़ ही हो रहे हैं,
बुआ बोली सुनो बच्चों मैं तुम्हें पटाखे दिलाऊंगी ,जिसमें थोड़ी सी फुलझड़ियां,होंगी चरखी होगी ।
इस बार की दीवाली को हम बहुत शानदार और अलग ढंग से मनायेंगे ,बहुत मजा आयेगा ,आज मुझे घर की साफ-सफाई करने दो । दीपावाली का त्यौहार  हम एक साथ मनायेंगे।
  दिपावली का दिन था, घर आँगन स्वच्छ ,थे घरों में यथासम्भव सजावट कर ली गयी थी ,
मिट्टी की सौंधी महक वाले दियों से आँगन में प्रवेश करते ही सौंधी-सौंधी खुशबू आ रही थी ।
आस-पड़ोसी और सगे-संबधियों का दीपावली की बधाई का सिलसिला चल रहा था ।
इतने में बच्चे भी आ गये ,हैप्पी दीपावली कहकर बुआ जी को घर की सजावट देखने लगे ।
   बुआ जी आपको अपना वादा याद है ना, हमें पटाखे दिलाने है । बुआ बोली हाँ-हाँ सब याद है ,चलो आ जाओ पहले कुछ नाश्ता कर लो । नाश्ता भी हो गया था ,बुआ जी अपने काम मे लगी हुयी थी ,इधर बच्चे परेशान की बुआ जी कब हमें पटाखे दिलायेंगी ।
बच्चे इतने बैचैन थे की बुआ को किसी से बात भी ढंग से नहीं करने दे रहे थे । आखिर बुआ जी बोली बच्चों आज दीपावली हम कुछ अलग ढंग से मनायेंगे ,चलो पहले बाजार चलते हैं, कुछ सामान खरीदते हैं ।
बच्चे और बुआ जी निकल पढ़े दीपावली की खरीदारी करने ।
सबसे पहले तो बुआ जी सड़क के किनारे बैठे मिट्टी के दिए लगाये बच्चे के पास रुकी सोचा कुछ दिये ले लूँ ,बुआ ने पैसे दिये दिये भी ले लिये ,फिर न जाने बुआ को क्या सूझी उस बच्चे से पूछ बैठी, बेटा तुम दीवाली कैसे मनाओगे ,पटाखे नहीं जलाओगे ,तुम्हारा मन नहीं करता पटाखे जलाने का बच्चा बोला ,नहीं मैडम जी हमारे पास कहाँ इतना समय की हम सोचे की हम पटाखे कब जलायेगें ,हम तो बस खुश हैं ,दो वक्त की रोटी के जुगाड़ मे ।
पिताजी हमारे हैं नहीं ,हमें पता नहीं कहाँ रहते हैं , माँ हैं, दो छोटी बहने हैं ,बहने घर पर हैं,माँ भी किसी के घर पर काम करती है । रात को थके हारे घर जायेंगे कुछ खायेंगे और सो जायेंगे।
   थोड़ी आगे चलकर एक पटाखों की दुकान आयी ,बुआ जी ने थोड़े पटाखे लिये ,जिसमे ,फुलझड़ियाँ और ,फिरकी साधारण पटाखे थे ,फिर मिठाई वाले की दुकान से मिठाई और बहुत सारा जरूरत का सामान खरीदा ।
बच्चे एक बार को बोले बुआ जी आपने पटाखे तो भुत कम लिये ,बुआ बोली पटाखे तो सब धुंआ हो जायेंगे ,तुम्हारी ख़ुशी के लिये थोड़े पटाखे ले लिये हैं ।
 बच्चों और बुआजी ने जो-जो खरीददारी करी थी ,वह सारा सामान उन्होंने गाड़ी में रखा ,और उत्सुकतावश गाड़ी में बैठ गये ,बच्चे खुश थे कि ,घर जाकर मिठाई खायेंगे पटाखे जलायेंगे। गाड़ी चल रही थी इतने में एक बच्चा बोला बुआजी यह रास्ता हमारे घर को तो नहीं जा रहा ,हम कहाँ जा रहे हैं ,बुआजी बोली देखते जाओ हम कहाँ जाते हैं ।
थोड़ी आगे जाकर बुआ जी ने गाड़ी रुकवायी ,फिर बच्चों को भी नीचे उतरने को कहा ,बच्चे गाड़ी से बाहर आ गये ,
दीदी ने सारा सामान बाहर निकाला ,बच्चे बोले बुआजी यहां कौन रहता है ,आपका जानकार ,बुआ बोली तो क्या हुआ जो हम किसी को नहीं जानते ,हम जान पहचान कर लेंगें ।
 इतने में नीची सी छत जिस पर बहुत सा पुराना समान पीडीए था ,कच्चे से कमरे के दरवाजे पर टंगे आधे-अधूरे पर्दे से एक बच्चा झाँकता हुआ दिखायी दिया,उस बच्चे की आँखे बड़ी उत्सुकता से हमें देख रही थी, इतने में अन्दर से दो बच्चे और दरवाजे पर खड़े हो गये ,ऐसा लग रहा था जैसे वो पूछना चाह रहे हों ,आप लोग यहाँ क्यों आये हैं ।
देखते-देखते कुछ बच्चे और कुछ बच्चों की मायें नन्हें मुन्नों को गोद में उठाये बाहर आ गयी ,उनमें से एक बोली क्या चाहते हैं आप लोग यहाँ क्यों आये हैं ,मैंने उन्हें बताया की हम उनके साथ दीवाली की खुशियां बांटना चाहते है ,महिला बोली अरे भेजी कहाँ आप कहाँ हम ।
हमारी दीवाली तो मिट्टी के दियों,खील पतासों ,और ये जो बच्चे फुलझड़ियां जला रहे है ना ,वहीं तक सीमित है ,आप जाइये हमारे बच्चों को ऐसे सपने मत दिखाईये बेकार में इन्हें गलत आदत लग जायेगी।
बाच्चों ने और बुआ जी ने मिठाइयां और पटाखे बच्चों में बाँटने शुरू किये बच्चे बहुत खुश थे ,सारे बच्चे एक दूसरे के साथ खेलने लगे पटाखे जलाने लगे ,बुआ जी ने बच्चों की माँ ओं को कुछ पैसे दिये अच्छे कपड़े बच्चों को दिलाने के लिये ।
सब बहुत खुश थे ,सभी बच्चे ऐसे मस्त हो गये थे काफी देर हो गयी थी ,बुआ जी ने बच्चों को आवाज लगायी ,सभी बहुत खुश थे जाते-जाते सबने एक दूसरे को happy Deepawali भी कहा सब खुश थे।
बुआ जी बच्चे गाड़ी में बैठकर घर जा रहे थे, बुआ जी ने बच्चों से पूछा बच्चों चिंता मत करो घर जाकर और पटाखे जलायेंगे मस्ती केरेंगे । बच्चे बोले बुआ जी आज तो मजा आ गया आज की दीपावली हम कभी नहीं भूलेंगे । अभी तक तो हम सोचते थे की मिठाई खाओ,पटाखे जलाओ हो गयी दीपावली ,आज पता चला कि असली दीपावली तो सबके साथ खुशियों की मिठाइयां बाँटने में और सबको खुश करने में होती है ।



**खूँटी पर बँधी है रस्सी**

खूँटी पर बँधी है रस्सी
एक डोर भवसागर की ओर
दूजी डोर धर्मराज की हाथ ।

धरती पर आया है ,
मुसाफ़िर बन कर
तू यूँ डाले है, धरती
पर डेरा ,जैसे की वापिसी
का टिकट ही न हो तेरा
हर एक का है,वापिसी का टिकट
 जीवन की डोर पहुँच रही है,ना जाने
किस-किस की धर्मराज के ,ओर
मौत की खूँटी पर लटकी है,गर्दन
पैर लटक रहे हैं कब्र पर
उस पर असीमित जिज्ञासाओं का मेला
दुनियाँ का मेला, मेले में हर शख्स अकेला
फिर काहे का तू पाले है,जिज्ञासाओं का झमेला,
क्यों करता है, तेरा-मेरा
दुनियाँ है,एक हसीन मेला
इस मेले से नहीं कुछ ले जा पायेगा
आ हम सब मिलकर अपनत्व के बीज डालें
परस्पर प्रेम की पौध उगा लें
भाईचारे संग प्रेम का वृक्ष जब पनप जायेगा
हमारे इस दुनिया से चले जाने के बाद भी
हमारा नाम रह जायेगा ।
मेले का आकर्षण बढ़ जायेगा
हर कोई परस्पर प्रेम का पाठ पड़ जायेगा ।।💐💐💐💐💐




**💐चाँद का दीदार**


💐* करने को चाँद का दीदार 
 मैंने आकाश की और निगाहें
जो डालीं,  निगाहें वहीं थम गयीं💐*

*आकाश में तो झिलमिलाते तारों** की 
बारात थी ,सितारों* का सुंदर संसार 
असँख्य सितारे** झिलमिला रहे थे।
मानों कोई जशन हो रहा हो *****
झिलमिलाते सितारों के बीच 
चाँदनी बिखेरते चाँद की चमकीली 
किरणें सलौनी और सुहानी।

दिव्य, अलौकिक किसी दूजे जहाँ
की परिकल्पना लिये ,मैं कुछ पल को
वहीं खो गया।
आकाश था,मैं था,सितारों* की बारात थी** 
चाँद की चाँदनी थी ,मानों आकाश के 
माथे पर सरल, निर्मल,सादगी, के श्रृंगार 
की बिंदिया ...
चाँद सी लगा के बिंदिया आकाश
अपने सादगी भरे श्रृंगार से सबको 
आकर्षित कर रहा था ।
सबको अपनी चाँदनी से आकर्षित
करते चाँद कुछ तो खास है तुझमें
जो तेरे दीदार से लोगों के दिलों के फैसले लिये
जाते हैं ।

"महत्वकांशाये"

 * महत्वकांशाएँ*   आकांक्षाएं तो बहुत होती हैं,
   परन्तु जो "महत्व" की "आकांशाएँ" होती हैं
   वो "महत्वकांशाएँ "होती हैं ।

* मैं जानता हूँ, कि तू बहुत महत्वकांशी
 है, ए मानव,तेरी काबलियत पर मुझे
 यकीन है *
"अभी तो तू कदम,दो क़दम चला है,
मैं नहीं चाहता तेरे क़दम रुक जायें।
तू जीत का जशन मनाना चाहता है ,
बहुत प्रसन्न हो रहा है, अभी तो तू एक
पड़ाव पर ही पहुंचा है ,मंजिल पर नहीं।


यही तेरी मंजिल है, ऐसा हो नहीं सकता
अभी तो तुझे बहुत ऊंची उड़ाने भरनी हैं "

उड़ान अभी बाकी है, अभी तो पंख फडफ़ड़ाएं हैं,
मैं जानता हूँ ,तेरी काबलियत,तेरी सोच से भी ऊँची है ।
अपनी छोटी सी जीत पर यूँ ना इतरा।
नहीं तो पाँव वहीं रुक जाएंगे।

"अहंकार का नशा चढ़ जायेगा
अंहकार के नशे मे तू सब कुछ भूल जायेगा"
जीत अभी बाकी है ,उड़ान अभी बाकी है ,
मंजिलें मिसाल अभी बाकी है ।
तेरे करिश्मों से अन्जान ,पर कद्रदान
अभी बाकी हैं ।



आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...