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" राम नाम धन "

" राम नाम धन "



    सिमरन ,सिमरन सिमरन
   नाम धन जो मैंने पाया,
मैंने तो मानों संजीवनी
खजाना पायो ।

सुमधुर सुरमयी
रूप माधुरी स्वरूप
तुम्हारो मनमोहिनी
नज़र हटे ना,नजर झुके ना
हर पल तुमको निहारूं।

जब कोई प्रभु  दिल से पुकारूं
तुम तब-तब  उसको जीवन सवारों

तुम ही जग के पलानहार
तुम ही सबको पार उतारो
तुम सबके दिल की जानो


तुम हो जो पुष्पों में सुगन्ध
प्रकृति में ज्यों प्राणवायु
आकाश में विद्युत तरंगे ।

भाव प्रेम और श्रद्धा हो तो
बड़ी सरलता से तुम मिल जाते
तर्क-वितर्क हो तो ना कोई तुमको
जाने ना पहचाने ।


मिलते तुम प्रभू उसी को
जो निर्मल मन से तुम्हें पुकारे ।


"करें योग निरोग रहें "

" करें योग निरोग रहें "
आलस्य को त्यागो
मेरे मित्रों अब तो जागो।

कब तक कडवी गोलीयाँ
निगलोगे । तन में रसायनों
का ज़हर भरोगे ।

करो योग रहो निरोग
योग से कट जातें हैं रोग।

यह है शुभ संयोग ,प्राचीन काल
से भरतीय परम्परा में योग का
है शुभ संयोग ।

आधुनिकता वाद के इस काल मे
जहाँ मशीनों की तरह भाग रहा है मानव
श्स्वन तंत्र में घुल रहा है जहर
आओ इस जहर को बाहर निकले ।

प्रतिदिन योग का समय निकालें
करें योग रहें निरोग ।।

*** जीतना सीखें****

* जितना सीखें*

कई बार ऐसा होता है की हमें किसी भी कार्य में सफलता हासिल नहीं होती । हमारी जी तोड़ मेहनत के बावजूत हमें अपनी मंजिल नहीं मिलती ,हम अन्दर से बुरी तरह टूट जाते हैं हर रास्ता अपना लिया होता कोई और रास्ता नजर नहीं आता।

हम निराशा के घने अन्धकार में घिरने लगते हैं,हमारा किसी काम में दिल नहीं लगता ।हम स्वयं को निठल्ला समझने लगते हैं यहाँ तक की दुनियाँ वाले भी हमें बेकार का या किसी काम का नहीं है ,समझकर दुत्कारते रहते हैं
और यही निराशा हमें बुरी तरह से तोड़ कर रख देती है।
और हम आत्महत्या तक के बारें में तकसोचने लगते हैं

1. सबसे पहले तो अपनी हार से निराश मत होइये

2, हार और जीत तो जीवन के दो पहलू हैं ।

3.हार की वजह ढूंढने की कोशिश करिये ।

4.अगर फिर भी सफलता नहीं मिलती तो रास्ता बदल लिजीये।

5.प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग पहचान होती है

6.सारे गुण एक में नहीं होते ,अपनी विशेषता पहचानिये।

7.आप में जो गुण है उसे निखारिये अपना सौ प्रतिशत लगा दीजिये सफलता निश्चित
 आपके कदम चूमेगी ।

8.बार -बार प्रयास करने पर भी अगर किसी काम में सफलता नहीं मिल रही है तो काम करने का तरीका बदल कर द…

*अन्नदाता *

धरती पर इन्सानों का भागवान
मेरे देश का किसान अन्नदाता
तू अन्नदाता फिर भी तेरा क्यों
कमतर है ,सम्मान प्रकृति की
मार भी तुझे सहनी पड़ती है।
कभी तन को झुलसा देने वाली गर्मी ,
कहीं बाड़ का प्रकोप ,कभी सूखे का कहर
जो अन्नदाता है उसे ही अपने परिवार की जीविका
के लिए पीना पड़ता है ज़हर
और कभी सूली पर लटक
देता है प्राण ।।। हाय मेरे देश का किसान
सर्वप्रथम किसानो दो को उच्चतम स्थान
उन जैसा नहीं कोई महान
मै दिल से करती हूँ तेरा सम्मान । ऐ किसान तू नहीं कोई साधारण इन्सान
तू अन्नदाता है ,इस सृष्टि का भगवान । तू तपति दोपहरी में खेतों मे काम करता है
सूखी रोटी ,तन पर एक वस्त्र अभावों में अक्सर
तेरा जीवन गुजरता है। अपनी आजीविका चलाने को, अपने और अपने परिवार
को दो रोटी खिलाने को तू ,न जाने कितनों के पेट भरता है ऐ किसान। ऐ मेरे देश के किसान ,तू महान है ।
तेरा क्या सम्मान करूँ ।तू स्वयं ही सम्माननीय । परमात्मा ने अपने ही कुछ दूतों को धरती पर किसान बनाकर भेजा होगा ।
नहीं तो यहाँ तो सबको अपने -अपने पेटों की पड़ी है । किसानों का सम्मान करो ,भारत एक कृषि प्रधान देश है अभिमान करो।
किसान नहीं होंगे तो ,भोजन कहाँ से लाओगे
क्या ? ईंट ,पत…

**मै इंसान **

ना जाने क्यों भटक जाता हूँ ,
 अच्छा खासा चल रहा होता हूँ," मैं"
 पर ना जाने क्या होता है ,
 ना जाने क्यों राहों के बीच मे ही उलझ जाता हूँ" मै"
जानता हूँ ,ये तो मेरी राह नहीं ,
मेरी मंजिल का रास्ता यहाँ से होकर तो नहीं जाता,
फिर भी न जाने क्यों ?आकर्षित हो जाता हूँ "मैं "
भटक जाता हूँ ,"मैं" हासिल कुछ भी नहीं होता
बस यूँ ही उलझ जाता हूँ "मै"फिर निराश -हताश
वापिस लौटकर अपनी राहों की और आता हूँ "मैं"
फिर आत्मा को चैन मिलता है ।
अपनी राह से कभी ना भटक जाने की सौगंध लेता हूँ।"मैं"
जीवन एक सुहाना सफ़र है ।
"मैं"मुसाफिर"अपने किरदार में सुंदर -सुंदर रंग भरना चाहता हूँ "मैं" बस हर दिल मैं प्यार भरना चाहता हूँ" मैं"
          बस जिन्दगी के नाटक मे अपना किरदार बखूबी निभाना चाहता हूँ "मै"

*तुम कभी मत टूटना *

जब मैं निकला था , मौसम बड़ा सुहाना था,
 कुछ पल बहुत हँसे मुस्कराए ,सुंदर -सुंदर ख्वाब सजाये ,  कुछ ख्वाब पूरे हुए ,कुछ अधूरे धूप तेज निकली ,गर्मी से मेरे होंठ सूखने लगे थे।  ख्वाब अभी पूरे भी नहीं हुए  थे ,राहों में कंकड़ आ गये ,कंकड़ हटाये फिर चलना शुरू कर  दिया ,फिर बाधाओं पर बाधा मैं कुछ पल रुका ,फिर चल दिया ,मैं चल ही रहा था ,तेज आँधी आ गयी फिर तूफ़ान पर   तूफ़ान मैं डरा सहमा , टूट सकता था ,और बिखर भी सकता था , पर मैं टिका रहा , माना की वक़्त मेरा साथ नहीं दे रहा था।  परन्तु मेरा हौंसला भी कम्बखत मेरा साथ नहीं छोड़ रहा था । थोड़ा वक़्त तो जरुर लगा ,मैं निराश भी हुआ ,परन्तु मेरे हौंसलों ने मरहम का काम किया तूफानों की चोटें अब भरने लगीं थी ।   सफ़र अब भी जारी था मेरा विश्वास मेरा हौंसला ही कम नहीं होने दे रहा था ।    
मौसम फिर से बदला ,सावन आया बादल बरसे खुशियों की बरसात हुई । मेरी आत्मशक्ति ने मेरी पीठ थपथपाई  ! क्योंकि मेरी आत्मा का विश्वास कभी टूटा नहीं ,उस  दृण  निश्चय विश्वास ने मुझे मेरी मंजिल तक पहूँचाया। जिन्दगी की दौड़ का एक फलसफा ही समझ आया उतार -चढाव तो आयेंगे ही धूप  से  पैर  भी …

**आँगन की कली**

चित्र
आँगन की कली *जब मैं घर में बेटी बनकर जन्मी सबके चेहरों पर हँसी थी , हँसी में भी ,पूरी ख़ुशी नहीं थी, लक्षमी बनकर आयी है ,शब्दों से सम्मान मिला । माता – पिता के दिल का टुकड़ा , चिड़िया सी चहकती , तितली सी थिरकती घर आँगन की शोभा बढ़ाती । ऊँची-ऊँची उड़ाने भरती आसमाँ से ऊँचे हौंसले , सबको अपने रंग में रंगने की प्रेरणा लिए माँ की लाड़ली बेटी ,भाई की प्यारी बहना ,पिता की राजकुमारी बन जाती । एक आँगन में पलती,   और किसी दूसरे आँगन की पालना करती । मेरे जीवन का बड़ा उद्देश्य ,एक नहीं दो-दो घरों की में कहलाती । कुछ तो देखा होगा मुझमे ,जो मुझे मिली ये बड़ी जिम्मेदारी। सहनशीलता का अद्भुत गुण मुझे मिला है , अपने मायके में होकर परायी ,  मैं ससुराल को अपना घर बनाती । एक नहीं दो -दो घरों की मैं कहलाती । ममता ,स्नेह ,प्रेम ,समर्पण  सहनशीलता  आदि गुणों से मैं पालित पोषित                                                                                                     मैं एक बेटी ,मैं एक नारी …. मेरी  परवरिश  लेती है , जिम्मेवारी , तभी तो धरती  पर सुसज्जित है , ज्ञान, साहस त्याग समर्पण प्रेम से फुलवारी    , ध…