सत्यम शिवम् सुंदरम्

वतन की मिट्टी से जब शहीदों के शौर्य की खुशबु आती है ,
            आँख नाम हो जाती है ,जुबाँ गुनगुनाती है ,
वन्दे मातरम् ,वंदे मातरम्   ,सारे जाहाँ से अच्छा दिन्दुस्तान हमारा ,
माँ सी ममता मिलती है ,रोम रोम प्रफुल्लित हो जाता
            जब  भारत  को भारत माँ  कह के बुलाता हूँ
भिभिन्न परम्परा में रंगा हुआ हूँ ,पर जब जब देश पर विपत्ति आती
                 एक रंग में रंग जाता हूँ ,
हिंदुत्व की पहचान ,हिंदी हमारी मात्र भाषा ,हिंदी में जो बिंदी है,
वह भारत माता के माथे का श्रृंगार,बिंदी की परम्परा वाला मेरे देश की
विशव में है विशिष्ट पहचान ,प्रगर्ति की सीढ़ियाँ चढ़ता
           उन्नति के शिखर को छूता, मेरा भारत महान
भारत माँ की छाती चौड़ी हो जाती ,जब शून्य डिग्री पर
खड़े सिपाही बन देश का रक्षा प्रहरी भारत माँ की खातिर
मर मिटने को अपने प्राणों की बलि चढ़ाये
नाज है, मुझे सवयं पर जो मैंने भारत की धरती पर जन्म लिया
जीवन मेरा सफल  होगा ,हिदुस्तान में फिर से राम राज्य.होगा
हिदुस्तान फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा।
इतना पावन है ,देश मेरा यहां नदियों में अमृत.बहता है ,
इंसान तो क्या पत्थर भी पूजा जाता है ।

रंग मंच

कारण  तो बहुत  हैं , शिकवे  शिकायतें करने  के 
 मगर  जब  से हमने हर  मौसम  में लुत्फ़ लेना सीख  लिया ,
जिंदगी के सब शिकवे बेकार हो गए ।
ज़िन्दगी  तो  बस एक नाटक  है , दुनियाँ के  रंगमंच में हमें अपने किरदार को बखूबी निभाना है ।
फिर क्यों रो _रो कर दुखी होकर गुजारें जिंदगी 
जीवन के हर किरदार  का  अपना एक अलग अंदाज़ है क्यों अपना-अपना किदार बखूबी निभा लें हम 
इस नाटक की एक विशेष बात है , क़ि हमने जो परमात्मा से मस्तिक्ष की निधि  पायी है ,
बस उस निधि का उपयोग  ,करने की जो छूट है ,उससे  हमें खुद के रास्ते बनाने होते हैं 
हमारी समझ हमारी राहें निशिचित करती हैं ,
परिश्रम ,निष्ठा, और निस्वार्थ कर्मों का मिश्रण जब होता है,
तब मानव  अपने किरदार में सूंदर रंग भारत है,और तरक्की की सीढियाँ चढ़ता है ,
भाग्य  को कोसने वाले अभागे होते हैं ,
वह अपने किदार में शुभ  कर्मों का पवित्र रंग तो भरते नहीं ,
फिर भाग्य को कोसते हैं , और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं 

      ठंडी -ठंडी छाँव  "माँ"

फरिश्तों के जहां से , वातसल्य कि सुनहरी चुनरियाँ ओढे ,
सुन्दर, सजीली ,मीठी ,रसीली ,
दिव्य आलौकिक प्रेम से प्रका शित ममता की देवी  'माँ '
परस्पर प्रेम ज्ञान के दीपक जला ती रहती। 
ममत्व की सुगन्ध कि निर्मल प्रवाह धारा 
 प्रेम के सुन्दर रंगो से दुनियाँ सजाती रहती 
समर्पित पूर्ण रूपेण समर्पित '

  ममता की ठंडी -ठंडी छाँव देने को ,
पवित्र गंगा की  धारा बन ,अवगुण सारे बहा ले जाती। 
निरंतर बहती रहती ,बच्चों कि जिंदग़ी सवांरने मे स्वयँ को भूल 
जीवन बिता देती ,          
 दर्द मे दवा ,बन  मुसकराती  रहती। 
बिन कहे दिल कि कर जाती 
जाने उसे कहाँ से आवाज़ आती ,
सभी बड़े -बड़े पदों पर बैठे जनों कि जननीं है, जननीं कि कुर्बानी। 
पर उसके दिल कि किसी ने नहीं जानी ,
वही  है ,दुर्गा , वही है लक्ष्मी ,सरस्वतीं ,काली  
दुनियाँ  सारी उसी से ,
यही तो है ,  दिव्य ,अलौकिक  जननीं कि निशानी 
बड़ी विचित्र ,है'' माँ ''  के दिल कि कहानी।

  ''   परियों वाली ऑन्टी ''

उस नन्हें बच्चे कि रोने कि आवाज़ें मानो कानोँ को चीर रही  थीं। दिल में एक गहरी चोट कर रही थी। बहुत सोचा दिल नहीं माना .  मैंने आख़िर दरवाजा खोलकर देख ही  लिया।
देखा तो दिल पहले से भी  अधिक दुः खी हो गया ,पांच साल कि नन्ही बच्ची दो साल के अपने छोटे भाई को लिये घर के बाहर बैठे थी और  अपने भाई  को सँभाल रही  थीं।  कई तरह के यत्न कर रही थी कि उसका भाई किसी तरह रोंना  बन्द कर दे। पर शायद वो भूखा था।  वो बहिन जो सवयं की देख -रेख भी ढंग से नही  कर सकती थी  वह  बहिन अपने भाई  को बड़े  यत्न से सँभाल रही थीं बहिन का फर्ज निभा रही थी।
बहुत पीड़ा हो रही थी उन बच्चों को देखकर ,शायद पेट कि क्षुधा को शान्त करने के लिये वह लड़की अपने भाई  को लेकर कभी किसी के घर के आगे बैठती कभी किसी के -----शायद कहीं से कुछ को खाने को मिल जाएं आखिर मेरे मन कि ममता ने मुझे धिक्करा मै जल्दि  से उन बच्चोँ के खा ने के लिये कुछ ले आई , लड़की ने तो झट से रोटी और सब्जी खा ली ,  परंतू भाई अभी भी  रो रहा था ,वह छोटा था ,मैने उसके भाई के लिये कुछ बिस्कीट खाने को दिये फ़िर जाकर वह बच्चा शान्त हुआ।
मेरे पूछने पर कि वो कहाँ रहती है उसके माँ -बाप कहाँ  हैं ,वह बच्ची बोळी वो पडोस मे एक नई बिल्डिंग बन रही है न मेरी मा तो वहाँ मज़दूरी करती  है,  थक जाती है ना इस लिये भाई को ढूध नहि पिला पाती ---
मै  हैरान थी कि इतनी छोटी सी उम्र मे कितना समझदार बना दिया है वक़्त ने इस बच्ची को , माइन पूछा पिता जी कहाँ है तो बोली पिताजी तो घर पर ही रहते हैं  माँ और हम जब शाम को घर जाते हैं तो मा ख़ाना बनती है पिताज़ी  झगड़ा करते रहते हैं मेरे पिताजी हमारे साथ खेलते भी नहीं ,जब ख़ाना बन जाता है तब हम सब खान खाते हैँ और ,फ़िर पितजी मा से झगड़ा करती हैं कुछ पैसे  लेते है ,फ़िर कही  बाहर  चले जाते हैँ ,फ़िर थोड़ी देर बाद आते हैं और ठीक से चल भी  नही  पा रहे होते हैं गिरते -गिरते लुढ़कते -लुढ़कते घर पहुँचते हैं फ़िर खटिया पर गिरते हैं और सो जाते हैं।
वह लड़की बड़े दर्द  भरी आवा ज मे बॉली ऑन्टी ह्मारे पितजी ऐसे क्योँ है सबके तो ऐसे नहीं होते ,ऑन्टी मेरा भी स्कूल जाने क मन करता है पर मै क्या करूँ ,,पता नही  हम स्कुल जा भी  पायेंगे या नही ,मैने ने उस बचची के सिर पर हाथ फेरते हुए  कहा जरूर कल से हि तुम स्कुल जाऊगी  तुम्हारे पिताजी भी ठीक हो जाएंगे हम उनको दवा देंगे। ----वो बच्ची मेरे  गले लग गयी  ,खुश होते हुए बोली सच ऑन्टी आप तो परियों वाली आन्टी हो।
मेरे पास शब्द नही थे --बच्ची के गाल पर फेरते हुए मानो मैने उसके दर्द को दूं  र  करने की शपथ ले ली थी कि आज से ये बच्ची हमेशा  मुस्कराती  रहेगी। पड़ लिखकर  आगे बढ़ेगी ---------

जिस  दिल में मोहब्ब्बत होती है  2

हंसना  ,मुस्कराना , इतराना , इठलाना ,
 यही तो  मोहब्बत  करने  वालों की पहचान  है ,
     मोहब्बत  में इंसान  सबसे अमीर हो। जाता है।
जेब  में ख़ाक। नहीं , दिल। में मोहब्बत। की नियामतें
   मोहब्बत में  इंसान  के पर  निकल  आते हैं ,

    हौंसलों  की  उड़ान  लम्बी  और पकड़  मजबूत  हो जाती है
 
   अपनी धुन में  मस्त  आवारा पंछी  ,
        दिल  में चुभन  चेहरे पर  मुस्कान ,
          बड़ा  देती  है,  चेहरे  की रौनके  ,

दिल को  किसी से बैर  नहीं , लाख  करे कोई  फरेब सही
या  यूं  कहिये ,  मोहब्बत अपना स्वभाव नहीं  छोड़ती।

दिल  की  खूबसूरत अदायें सब कुछ सवाँर देती  हैं ,

खुशमिजाजी   मोहब्बत  करने वालों का स्वभाव बन बन जाता है ।

''हिंदी  मेरी मातृभाषा माँ तुल्य पूजनीय ''       

  जिस भाषा को बोलकर  मैंने अपने भावों को व्यक्त किया ,जिस भाषा को बोलकर मुझे मेरी पहचान मिली ,मुझे हिंदुस्तानी होने का गौरव प्राप्त हुआ   ,                            उस माँ तुल्य हिंदी भाषा को मेरा शत -शत नमन।

भाषा विहीन मनुष्य अधूरा है।
 भाषा ही वह साधन है जिसने सम्पूर्ण विशव के जनसम्पर्क को जोड़ रखा है।  जब शिशु इस धरती पर जन्म लेता है ,तो उसे एक ही  भाषा आती है वह है,  भावों की भाषा ,परन्तु भावों की भाषा का क्षेत्र सिमित है।
मेरी मातृभाषा हिंदी सब भाषाओँ में श्रेष्ठ है।  संस्कृत से जन्मी देवनागरी लिपि में वर्णित हिंदी सब भाषाओँ में श्रेष्ट है।  अपनी मातृभाषा का प्रयोग  करते समय मुझे अपने  भारतीय होने का गर्व होता है।  मातृभाषा बोलते हुए मुझे अपने देश के प्रति मातृत्व के भाव प्रकट होते हैं।   मेरी मातृभाषा हिंदी मुझे मेरे देश की मिट्टी  की  सोंधी -सोंधी महक देती रहती हैं  ,और भारतमाता    माँ  सी  ममता।    
आज का मानव स्वयं को  आधुनिक कहलाने की होड़ में  'टाट में पैबंद ' की तरह अंग्रेजी के साधारण  शब्दों का प्रयोग कर स्वयं को  आधुनिक समझता  है।
अरे जो नहीं कर पाया अपनी मातृ भाषा का सम्मान उसका स्वयं का सम्मान भी अधूरा है।  किसी भी भाषा का ज्ञान होना अनुचित नहीं   अंग्रेजी  अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। इसका ज्ञान होना अनुचित नहीं।
परन्तु माँ तुल्य अपनी मातृभाषा का प्रयोग करने में स्वयं में हीनता का भाव होना स्व्यम का अपमान है।
मातृभाषा का सम्मान करने में स्वयं को  गौरवान्वित  महसूस करें।   मातृभाषा का सम्मान  माँ का सम्मान है.
हिंदी भाषा के कई महान ग्रन्थ सहित्य ,उपनिषद ' रामायण ' भगवद्गीता ' इत्यादि महान ग्रन्थ युगों -युगों से  विश्वस्तरीय  ज्ञान की  निधियों के रूप में आज भी सम्पूर्ण विश्व का ज्ञानवर्धन कर रहे हैं व् अपना लोहा मनवा रहे है।
भाषा स्वयमेव ज्ञान की देवी सरस्वती जी का रूप हैं।   भाषा ने ही ज्ञान  की धरा को आज तक जीवित रखे हुए हैं
मेरी मातृभाषा हिंदी  को मेरा  शत -शत  नमन  आज अपनी भाषा हिंदी के माध्यम से मैं अपनी बात लिखकर आप तक पहुंचा रही हूँ।   

बुलंदी की ऊँचाइयाँ  

बुलन्दी की ऊँचाइयाँ कभी भी अकेले आसमान नहीं छू पाती ,परस्पर प्रेम ,मैत्री ,सद्भावना  विश्व्कुटुम्ब्क की भावना  ही तरक्की की  सीढ़ियां हैं।
धार्मिक संगठन किसी भी देश -प्रदेश की भगौलिक प्राकृतिक परिस्थियों के अनुरूप नियमों का पालन करते हुए अनुशासन में रहते हुए संगठन में रहने के गुण भी सिखाता है।
अपनी विषेश पहचान बनाने के लिये या यूं कहिए की अपने रीती -रिवाज़ों को अपनी परम्पराओं व् संस्कृति को जीवित रखने के लिए किसी भी धर्म जाती या  संगठन या समूह का निर्माण प्रारम्भ हुआ होगा इसमें कोई दो राय नहीं हैँ,ना ही यह अनुचित है। परन्तु कोई भी धर्म या परम्परा जब जड़ हो जाती है ,भले बुरे के ज्ञान के अभाव में आँखों में पट्टी बाँध सिर्फ उन परम्पराओं का निर्वाह किया जाता है ,तो वह निरर्थक हो जाती है।
समय।,काल ,वातावरण के अनुरूप परम्पराओं में परिवर्तन होते रहना चाहिए परिवर्तन जो प्रगर्ति का सूचक हो। शायद ही कोई धर्म किसी का अहित करने को कहता हो ,
कोई भी इंसान जब जन्म लेता है ,एक सा जन्मता है सबकी रक्तवाहिनियों में बहने वाले रक्त का रंग भी एक ही होता है' लाल '. हाँ किसी भी क्षेत्र की जलवायु वहां के रहन -सहन के विभिन्न तौर -तरीकों की व्भिन्नता के कारण इंसान की चमड़ी के रंग में परिवर्तन अवशय होता है। अतः धर्म  जाती के नाम पर लड़ना आतंक फैलाना स्वार्थ सिद्ध करना कोई भी धर्म  या धर्म  ग्रन्थ धर्म  के नाम पर लडना नहीं सीखता।धर्म की आड़ लेकर कई संगठन विभिन्न भ्रांतियाँ फैलाना स्वार्थ सिद्धि के लिए आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं ,आतंकवाद से किसी का भला होने वाला नहीं है, सिर्फ विनाश ही विनाश---------
एक मजबूत किले की दीवार के लिए ईंठ ,पत्थर ,सीमेंट इत्यादि सभी को एक होकर एक रंग में रंगना पढ़ता है। तभी ऐतिहासिक इमारतें बनती हैं  इतिहास भी इस बात का ग्वाह है।
अतः मेरा देश महान मेरा भारत महान तो सभी कहते हैं ,देश महान तभी बनेगा जब हम सब धर्म  जातिवाद व् स्वार्थवाद से ऊपर उठकर प्रेम सद्भावना के रंग में रंग कर देश की उन्नति के लिए अग्रसर होंगे। अतः प्रत्येक मनुष्य जाती का धर्म परस्पर प्रेम ही होना चाहिये।

आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...