** चिंगारी **

*** जब लौ बनकर दीपक
में जली सभी दिशाओं
 को  प्रकाशित किया 
मैं तेज़ का पुंज,
प्रकाश की किरण 
चिंगारी थी ,सिमट गई तो 
सार्थक हुई, 
बिखरी तो तितर -बितर हुई
स्वयं भी स्वाहा हुई
जहां गिरी वहां 
सब राख किया
मेरी चमक में कई बहके -भटके
कईयों ने तो अपने घर भी जलाए
उपयोग की उपयोगिता को तब
सही राह मिली, जब मेरा संयोजन हुआ
मैं चिंगारी ,मेरा अस्तित्व प्रकाश
मेरी उपयोगिता तब सार्थक हुई
जब भटकते हुओं को सही राह मिली.....




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