कोरा काग़ज़ है ,या हसीन ख़्वाब है ज़िन्दगी 🌸🌸

“यूँ तो कोरा काग़ज़ है ज़िन्दगी
  ये भी सच है ,कि कर्मों का
 हिसाब - किताब है ज़िन्दगी “

 “कोरा काग़ज़ है या हसीन ख़्वाब है
             ज़िन्दगी
दूर से देखा तो आफ़ताब है ज़िन्दगी
-                  -                      -
कहीं समतल कहीं गहरी खाई
तो कहीं पहाड़ सी है ,ज़िन्दगी “

  “पृष्ठ भूमि भी हमारे ही
  द्वारा सृजित है ।
  कर्मों पर ध्यान दे रे बन्दे
  जो आज तू करता है
 वही तेरा कल बनता है “


“ बड़ी कमबख़्त है ये ज़िन्दगी भी
 देखने वाले के लिये हसीन ख़्वाब
जीने वाले के लिए जंग है ज़िन्दगी”


“ किराये के मकान जैसी है
  ये ज़िन्दगी भी
  कब ख़ाली करनी पड़
  जाये कौन जानता है “

“दिया है,प्रकाश है ,साँस है
तभी तक आस है
वरना मिट्टी है ,और राख है “


 “ना शिकवा करता हूँ ,
ना शिकायत करता हूँ
मैं वो श्क्स हूँ जो बेरूखियों
के जहाँ में ,वफ़ा की इबादत करता हूँ “

“ज़िन्दगी के सफ़र में मुसाफ़िर
बनकर रहता हूँ ,
जीता हर लम्हे को हूँ
शिकवा -शिकायतों से दूर रहता हूँ “

“भाग्य को कोसना छोड़ दे बन्दे
तू स्वयं का भाग्यविधता है “




टिप्पणियाँ

  1. वाह!!! बहुत खूब .. मन में गहरे उतरते भाव

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  2. बहुत खूब ...
    क्या क्या है जिंदगी यही तो किसी को पता नहीं चल पाता ...

    जवाब देंहटाएं
  3. क्या बहुत है बहुत सुंदर रचना ऋतु जी👌👌

    जवाब देंहटाएं

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