**औकात की बात मत करना **


** एक गाँव मे एक सेठ रहता था ,उसका अपने गाँव में बड़ा ही नाम था कहते हैं ,वह सेठ बहुत बड़ा दानी भी था ।

कोई भी शुभ दिन हो ,कोई त्यौहार हो ,वह सेठ गरीबों को भोजन कराता, भोजन कराने के बाद वह सेठ सबको दक्षिणा भी देता , और कोई जो  कुछ माँगता उसे यथासम्भव देता। सब लोग सेठ के सामने नतमस्तक होते और जय-जय हो सेठ जी की जय हो जय हो कहते ।

 परन्तु उनमें से एक बूढ़ा फ़कीर हाथ जोड़ कर कहता खुश रहो,सेठ जी भगवान आपको और दे ।
सेठ जी काफी समय ... उस बूढ़े फ़कीर की इस हरक़त से सोच में रहते कि बाकी सब लोग तो मेरे सामने नतमस्तक होते हैं, और जय-जयकार बोलते हैं ,और ये फ़क़ीर उल्टा मुझे ही आशीर्वाद देता है ,जैसे ये ही मुझे सब दे रहा हो।

एक दिन सेठ ने उस बूढ़े फ़कीर से पूछ ही लिया,एक बात बता

 प्रश्न :- फ़क़ीर ? तुम्हें भोजन किसने कराया ?

उत्तर:- बुढे फ़क़ीर ने कहा-- जी सेठ जी आपने ।

प्रश्न- सेठ जी ने पूछा तुम्हें पैसे किसने दिये ?

उत्तर:-बूढ़े फ़क़ीर ने कहा --सेठ जी आपने

प्रश्न :-  सेठ जी बोले तो फिर तू मेरे सामने सिर क्यों नही
झुकाता ,ना ही मेरी जय-जयकार बोलता है ,तू फ़क़ीर होकर मुझे आर्शीवाद देता है, औकात क्या है तेरी ?

बूडा फ़क़ीर मुस्कराया और बोला सेठ जी जरूर आपने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे जो भगवान ने आपको इतना सब कुछ दिया ,आप बहुत अच्छा करते हैं जो अपने धन के *भंडार में से कुछ गरीबों की सेवा मे लगा देते हैं।
जहाँ तक बात औकात की है। औकात आपकी भी वही है ,जो मेरी है ,बस आपके बस जीवन जीने के साधनों के लिये धन-दौलत अधिक है ,सारी दौलत यहीं रह जायेगी सेठ जी आपके साथ नही जायेगी । आप को भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, और मुझे भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, फिर किस की क्या औकात।।
 *औकात की बात मत किया कर ऐ बन्दे,
   औकात तेरी भी वही है,जो मेरी है।
    चन्द सोने-चाँदी के सिक्कों से दुनियाँ भर की
     जरूरतें खरीदी जा सकती हैं
       पर इन्सानियत नहीं।
         इंसानियत कहीं बाज़ारों में नहीं बिकती ।
       **इंसानियत ,इंसान के अच्छे कर्मों में मिलती है।**
          हम तो फ़कीर हैं, हमें फ़िकर नहीं किसी बात की
          फ़िकर नहीं ,तभी तो औकात रखते हैं चाँद ,सितारों
          को छूने की ..........** आशीषें देने की और दुआएं                लुटाने की.......*******
     

टिप्पणियाँ

  1. सही कहा है ... सब इंसान एक से हैं उर अपने कर्मों से जाने जाते हैं ... सबको अंत में एक ही जगह जाना है ... फिर किस की क्या औक़ात ... अच्छी बोध कहानी है ...

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  2. रचना पढ़ने और प्रोत्साहित करने हेतु धन्यवाद दिगम्बर नवासा जी ।

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  3. बिल्कुल सही कहा रितु, इंसानियत कहीं बाज़ारों में नहीं बिकती । इंसानियत ,इंसान के अच्छे कर्मों में मिलती है।
    बहुत बढ़िया कहानी।

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  4. जी ज्योति जी काश हमारे देश के लोग इन्सानियत से भरपूर हो जाएं ।

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  5. जी ज्योति जी काश हमारे देश के लोग इन्सानियत से भरपूर हो जाएं ।

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  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 21 अप्रैल 2017 को लिंक की गई है...............http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  7. बहुत ही मार्मिक वर्णन जीवन के सारभौमिक सत्य का। आपसे निवेदन है मेरी रचना "बेपरवाह क़ब्रे" अवश्य पढ़े। आभार

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  8. बहुत अच्छी प्रेरक बोध कहानी ...

    सब ठाठ पड़ा रह जावेगा,
    जब लाद चलेगा बंजारा।

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  9. संसार की असारता का बोध एक छोटी सी लघुकथा के माध्यम से। आपकी प्रस्तुति अपना प्रभाव छोड़ने में असरदार साबित हुई है। बधाई।

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  10. धन्यवाद ,रविन्द्र जी ,कविताजी,और ध्रुव जी ।

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  11. धन्यवाद ध्रुव सिंह जी ,मैं आपके लेख अक्सर पड़ती हूँ आपके लेखों में बहुत ही गूढ़ रहस्य छिपा होता है ।आप बहुत बेहतरीन लिखते हैं ।

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*****उम्मीद की किरण*****